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झारखंड में कोयले से होने वाले जस्ट ट्रांजिशन पर चर्चा की जरूरत क्यों?

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झारखंड में कोयले से होने वाले जस्ट ट्रांजिशन पर चर्चा की जरूरत क्यों?

झारखंड में जस्ट ट्रांजिशन पर गंभीर मंथन की जरूरत है इस संबंध में साल 2020 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर ए माशेलकर ने अपनी रिपोर्ट में कहा था. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में यह बताया था कि झारखंड में कोयले पर निर्भर लोगों का जीवन कोयला खदानों के बंद होने पर किस कदर प्रभावित होगा और उन्हें किस तरह न्यायोचित ढंग से नये रोजगार में लगाया जाये.

हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रहा देश

इस रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत जब तेजी से हरित ऊर्जा को अपनाने की ओर बढ़ रहा है तो किस तरह कोयला जैसे ऊर्जा के प्रमुख स्रोत पर निर्भर रहने वाले लोगों को रोजगार के बेहतर अवसर और सामाजिक सहायता उपलब्ध कराई जाये.

पेरिस समझौते में जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा शामिल

गौरतलब है कि 2015 में हुए पेरिस समझौते में जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा शामिल थी, इसकी वजह यह थी कि उस वक्त इस बात का ख्याल रखा गया था कि जब मानव समाज जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों को पूरा करने में जुटा हो कोयले से अपनी जिंदगी जीने वालों के साथ कोई अन्याय ना हो.

चंद्रभूषण, श्रेष्ठा बनर्जी और श्रुति अग्रवाल की रिपोर्ट

साल 2021 में चंद्रभूषण, श्रेष्ठा बनर्जी और श्रुति अग्रवाल की एक रिपोर्ट सामने अयी, इस रिपोर्ट में भी यह बताया गया है कि झारखंड जो कि भारत के शीर्ष कोयला खनन वाले राज्यों में शामिल है, जहां जस्ट ट्रांजिशन पर नीति बनाये जाने की जरूरत है. केंद्र सरकार ने देश को 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है, वहीं एक आंकड़ा यह भी है कि देश में 2030 तक कोयले का खपत अपने चरम पर होगा.

अचानक कम हो सकती है कोयले की खपत

ऐसे में यह बात तयशुदा मानी जा रही है कि देश में अचानक से कोयले की खपत कम होगी और खदानों को बंद करने का सिलसिला शुरू होगा या फिर वे खुद ही बंद होने लगेंगी, क्योंकि उनका उत्पादन गिर जायेगा. ऐसे में रोजगार की हानि तय है और आय घटने से आम आदमी परेशानी में आ जायेगा.

सच्चाई स्वीकार करने से बच रहे हैं लोग

कोयला खदानों को बंद करने से इसके गंभीर सामाजिक और आर्थिक परिणाम होंगे, जिसपर अभी से विचार करने और नीति बनाये जाने की जरूरत है, अन्यथा यह स्थिति हमारे लिए विनाशकारी साबित हो सकती है. हालांकि अभी इस सच्चाई को स्वीकार करने में लोग संकोच कर रहे हैं और उनका यह कहना है कि कोयला ही ऊर्जा क्षेत्र का भविष्य है और अगले सौ सालों तक इसकी जगह कोई नहीं ले सकता.

झारखंड में 50% से अधिक कोयला खदानें बंद

लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि अभी ही झारखंड में 50% से अधिक कोयला खदानें बंद हैं, जिनमें ओपनकास्ट और भूमिगत खदानें दोनों शामिल हैं. ऐसे में जब देश में कोयले की खपत कम होगी और ऊर्जा के अन्य विकल्पों का प्रसार तेजी से होगा, जो लोगों को कई सुविधाएं देंगे, मसलन कम खर्च आना और पर्यावरण के अनुकूल होना तो खदानें बंद होंगी इसमें कोई दो राय नहीं है.

कई खदान घाटे में 

रिपोर्ट में झारखंड के रामगढ़ जिले का अध्ययन किया गया है, जिसमें यह बताया गया है कि रामगढ़ झारखंड के शीर्ष कोयला खनन वाले जिलों में से एक है. यहां प्रति वर्ष लगभग 13 मिलियन टन कोयले का उत्पादन होता है. हालांकि, पिछले चार वर्षों में उत्पादन में लगातार गिरावट आ रही है. वर्तमान में जिले की कुल 24 कोयला खदानों में से 50% अलाभकारी सहित विभिन्न कारणों से बंद या अस्थायी रूप से बंद कर दी गई है. विगत कुछ वर्षों में यहां खदान क्षेत्रों का विस्तार भी नहीं हुआ है. एक खदान का उत्पादक जीवन 10-25 वर्ष होता है, ऐसे में यहां खदानों के बंद होने और उसके बाद की गंभीर स्थिति उत्पन्न होने की बहुत अधिक संभावना है. यही वजह है कि रिपोर्ट में स्थानीय लोगों को सामाजिक और आर्थिक सहायता पहुंचाने के लिए जस्ट ट्रांजिशन पर विचार की जरूरत को बल दिया गया है.

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राजनीतिक प्रतिबद्धता की जरूरत

गौरतलब है कि झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी इस बात को स्वीकार कर चुके है कि समय के साथ झारखंड में कोयला कम होता जाएगा और तब कि स्थिति के लिए हमें योजनाएं बनानी होगी. इसमें कोई दो राय नहीं है कि जस्ट ट्रांजिशन तभी सफलतापूर्वक संभव होगा जब राजनीतिक शक्ति इसके लिए मजबूती से खड़ी होगी.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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