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जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में आठ साल बाद भी नहीं खुला जन औषधि केंद्र, मरीजों को नहीं मिल रही सस्ती दवा

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जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में आठ साल बाद भी नहीं खुला जन औषधि केंद्र, मरीजों को नहीं मिल रही सस्ती दवा
जमशेदपुर का एमजीएम अस्पताल. फोटो: प्रभात खबर

जमशेदपुर से चंद्रशेखर की रिपोर्ट

Jamshedpur News: जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एमजीएम अस्पताल) में पिछले आठ साल से जन औषधि केंद्र खोलने की कवायद चल रही है, लेकिन प्रशासनिक लेती-लतीफी के कारण यह योजना अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी है. इसका सीधा खमियाजा अस्पताल में इलाज कराने आने वाले गरीब मरीजों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें मजबूरन बाहर की दुकानों से महंगे दामों पर दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं. शुरुआत में इसे साकची स्थित पुराने एमजीएम अस्पताल में खोला जाना था. वहां बिल्डिंग टूटने के बाद अब एमजीएम की नयी बिल्डिंग में इसे शुरू करने की तैयारी है, लेकिन मामला अब भी अधर में लटका हुआ है.

दो दावेदारों के बीच फंसा पेच, मुख्यालय से मांगा निर्देश

अस्पताल के अधीक्षक डॉ बलराम झा ने बताया कि जन औषधि केंद्र खोलने के लिए टेंडर की प्रक्रिया कर ली गयी है. लेकिन, टेंडर में दो लोगों के समान (टाई) होने के कारण मामला अटक गया है. इस संबंध में दिशा-निर्देश के लिए विभाग (मुख्यालय) को पत्र लिखा गया है. वहां से हरी झंडी मिलते ही केंद्र की शुरुआत कर दी जायेगी. इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए डीडीसी के नेतृत्व में एक कमेटी गठित की गयी है, जिसमें ड्रग इंस्पेक्टर भी शामिल हैं.

मरीजों को मिलेगी 60 से 80 फीसदी तक की छूट

जन औषधि केंद्र में लगभग 585 प्रकार की दवाएं उपलब्ध रहती हैं, जिनमें ब्लड प्रेशर, शुगर से लेकर लगभग हर गंभीर बीमारी की दवाएं शामिल हैं. बाजार की तुलना में यहां दवाएं 60 से 80 प्रतिशत तक सस्ती मिलती हैं. बीपी और शुगर के मरीजों को रोजाना दवा खानी पड़ती है, इसलिए इस केंद्र के खुलने से उन्हें सबसे ज्यादा आर्थिक राहत मिलेगी.

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सिर्फ सदर अस्पताल में चल रहा है जन औषधि केंद्र

जिले में सिर्फ सदर अस्पताल में ही जन औषधि केंद्र चल रहा है. वर्तमान में सदर अस्पताल के जन औषधि केंद्र में 76 किस्म की दवाएं उपलब्ध हैं. यहां इलाज कराने आने वाले मरीजों को अधिकतर दवाएं जन औषधि केंद्र से मिल जाती हैं, जिससे उन्हें काफी फायदा मिलता है. अस्पताल में अधिकतर गरीब मरीज इलाज कराने के लिए आते हैं और उन लोगों के पास इतने पैसे नहीं होते कि वे बाहर से महंगी दवाओं की खरीदारी कर सकें.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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