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Home झारखण्ड जमशेदपुर जमशेदपुर में बापू ने 100 साल पहले कहा था, ‘मुझे मजदूर होने पर गर्व है’

जमशेदपुर में बापू ने 100 साल पहले कहा था, ‘मुझे मजदूर होने पर गर्व है’

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जमशेदपुर में बापू ने 100 साल पहले कहा था, ‘मुझे मजदूर होने पर गर्व है’
1934 में जमशेदपुर के धातकीडीह में चंदा इकट्ठा करते महात्मा गांधी.

जमशेदपुर से ब्रजेश सिंह की रिपोर्ट

Mahatma Gandhi Death Anniversary: अहिंसा और सत्य के बल पर देश को आजादी की राह दिखाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जमशेदपुर से रिश्ता केवल औपचारिक नहीं, बल्कि बेहद आत्मीय और संघर्ष से जुड़ा रहा है. स्वदेशी आंदोलन से लेकर श्रमिक चेतना के विस्तार तक, जमशेदपुर ने गांधीजी के विचारों को न सिर्फ अपनाया बल्कि उन्हें जमीन पर उतारने में भी अहम भूमिका निभाई. यही वजह है कि गांधीजी का जमशेदपुर आना केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि मजदूर आंदोलन के इतिहास का अहम अध्याय बन गया. उनकी पहली जमशेदपुर यात्रा को अब 100 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन उनका प्रभाव आज भी यहां के श्रमिक आंदोलनों में महसूस किया जाता है.

जमशेदपुर से गांधीजी का गहरा जुड़ाव

गांधीजी का जमशेदपुर से जुड़ाव उस दौर में बना, जब देश में औद्योगिक विकास के साथ-साथ मजदूरों के अधिकारों को लेकर संघर्ष तेज हो रहा था. टाटा स्टील जैसे बड़े औद्योगिक संस्थान के कारण जमशेदपुर मजदूर आंदोलनों का बड़ा केंद्र बन चुका था. गांधीजी यहां के मजदूरों की स्थिति से भली-भांति परिचित थे और उनका मानना था कि बिना श्रमिकों के सहयोग के किसी भी उद्योग की प्रगति संभव नहीं है. यही सोच उन्हें जमशेदपुर तक खींच लाई.

जनसभा में गांधीजी का ऐतिहासिक बयान

जमशेदपुर की एक ऐतिहासिक जनसभा में गांधीजी ने मजदूरों को संबोधित करते हुए कहा था कि वे स्वयं को झाड़ूवाला, बुनकर, किसान और मजदूर कहने में गर्व महसूस करते हैं. उन्होंने साफ कहा था कि मजदूरी के बिना कुछ भी संभव नहीं है. गांधीजी ने यह भी कहा कि पूंजी से उनकी मित्रता है, लेकिन उनकी असली पहचान मजदूर से है. यह बयान उस दौर में मजदूर वर्ग के लिए नई ऊर्जा और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया था.

टाटा स्टील मजदूर हड़ताल और संकट का दौर

वर्ष 1924 में टाटा स्टील के मजदूर विभिन्न मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गए थे. हड़ताल के कारण उद्योग प्रबंधन और मजदूरों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा था. स्थिति को संभालना दोनों पक्षों के लिए मुश्किल हो गया था. मजदूरों ने इस संकट के समाधान के लिए महात्मा गांधी से हस्तक्षेप करने की अपील की. गांधीजी ने मजदूरों की भावना को समझते हुए जमशेदपुर आने का निर्णय लिया.

1925 में पहली औपचारिक जमशेदपुर यात्रा

आठ अगस्त 1925 को महात्मा गांधी पहली बार औपचारिक रूप से जमशेदपुर पहुंचे. उनके साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे. बिष्टुपुर स्थित टिस्को इंस्टिट्यूट, जिसे आज यूनाइटेड क्लब के नाम से जाना जाता है, में एक विशाल सभा आयोजित की गई. इस सभा में लगभग 20 हजार लोगों की भीड़ उमड़ी थी. उस समय टाटा वर्कर्स यूनियन को जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन के नाम से जाना जाता था. गांधीजी का स्वागत मजदूरों ने पूरे उत्साह के साथ किया.

बिष्टुपुर में ठहराव और यूनियन कार्यालय का उद्घाटन

गांधीजी बिष्टुपुर के आउटर सर्किल रोड स्थित एस-6, क्वार्टर नंबर-1 में ठहरे थे. यहीं से उन्होंने मजदूरों और प्रबंधन के बीच संवाद की पहल की. इसी दौरान उन्होंने यूनियन कार्यालय का उद्घाटन भी किया. गांधीजी का मानना था कि किसी भी श्रमिक आंदोलन की सफलता के लिए स्वच्छ नेतृत्व और निरंतर संवाद बेहद जरूरी है. उन्होंने मजदूरों को संयम और अनुशासन के साथ अपनी बात रखने की सलाह दी.

संवाद से खत्म हुई हड़ताल

गांधीजी के हस्तक्षेप के बाद मजदूरों और टाटा प्रबंधन के बीच बातचीत का रास्ता खुला. उन्होंने दोनों पक्षों को समझाया कि टकराव के बजाय संवाद ही समस्याओं का स्थायी समाधान है. गांधीजी की पहल पर ही मजदूरों की हड़ताल समाप्त हुई. यह घटना न केवल जमशेदपुर बल्कि देश के औद्योगिक इतिहास में भी एक मिसाल बन गई. इससे यह साबित हुआ कि अहिंसा और संवाद के जरिए भी बड़े संकटों का समाधान निकाला जा सकता है.

टाटा वर्कर्स यूनियन की नींव

गांधीजी के विचारों और मार्गदर्शन से ही टाटा वर्कर्स यूनियन के स्थायी कार्यालय की नींव पड़ी. उन्होंने मजदूरों को संगठित रहने और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने का संदेश दिया. जमशेदपुर में आज भी टाटा वर्कर्स यूनियन का मजबूत ढांचा गांधीजी की उसी सोच की याद दिलाता है.

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आज भी प्रासंगिक हैं गांधीजी के विचार

महात्मा गांधी का जमशेदपुर से जुड़ाव केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि आज भी उतना ही प्रासंगिक है. मजदूरों के सम्मान, संवाद और सामाजिक समरसता पर दिए गए उनके संदेश आज के औद्योगिक समाज के लिए भी मार्गदर्शक हैं. गांधीजी ने जमशेदपुर की धरती से जो संदेश दिया था, वह आज भी मजदूर आंदोलन और सामाजिक चेतना की मजबूत नींव बना हुआ है.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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