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Home झारखण्ड हजारीबाग डीओ साहब! हजारीबाग के सीएम एक्सीलेंस स्कूल में 7 बच्चों पर एक टीचर और गांवों में 60 पर एक, ऐसा क्यों?

डीओ साहब! हजारीबाग के सीएम एक्सीलेंस स्कूल में 7 बच्चों पर एक टीचर और गांवों में 60 पर एक, ऐसा क्यों?

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डीओ साहब! हजारीबाग के सीएम एक्सीलेंस स्कूल में 7 बच्चों पर एक टीचर और गांवों में 60 पर एक, ऐसा क्यों?
हजारीबाग का सीएम एक्सीलेंस स्कूल. फोटो: प्रभात खबर.

हजारीबाग से आरिफ की रिपोर्ट

Hazaribagh News: झारखंड के हजारीबाग जिले में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती को लेकर गंभीर असंतुलन सामने आया है. एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों के कई विद्यालय शिक्षक की कमी का सामना रहे हैं, जहां एक शिक्षक पर 50 से 60 या उससे अधिक विद्यार्थियों की जिम्मेदारी है. वहीं दूसरी ओर, शहर के सीएम एक्सीलेंस स्कूल में 7 से 12 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक उपलब्ध हैं. यह स्थिति तब है जब सरकार ने स्पष्ट रूप से 40 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक का मानक निर्धारित कर रखा है. ऐसे में शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और शिक्षक पदस्थापन की व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं.

सीएम एक्सीलेंस स्कूल में सबसे कम छात्र-शिक्षक अनुपात

सबसे अधिक चर्चा गवर्नमेंट गर्ल्स प्लस टू उच्च विद्यालय, हजारीबाग की हो रही है, जिसे सीएम उत्कृष्ट बालिका प्लस टू उच्च विद्यालय के रूप में विकसित किया गया है. यहां वर्तमान में 308 छात्राएं नामांकित हैं, जबकि शिक्षकों की संख्या 43 है. इस हिसाब से औसतन सात विद्यार्थियों पर एक शिक्षक कार्यरत हैं. यदि 11वीं कक्षा के लिए निर्धारित 120 सीटों को भी जोड़ दिया जाए तो विद्यार्थियों की संख्या 420 हो जाती है. इसके बावजूद यहां लगभग नौ विद्यार्थियों पर एक शिक्षक उपलब्ध रहेगा. यह अनुपात सरकारी मानकों की तुलना में काफी बेहतर है, लेकिन जिले के अन्य विद्यालयों की स्थिति को देखते हुए यह असंतुलन का संकेत भी देता है.

जरूरत से ज्यादा विषयवार शिक्षक

विद्यालय में विषयवार शिक्षकों की संख्या भी चर्चा का विषय बनी हुई है. यहां हिंदी के तीन, अंग्रेजी के चार, गणित के चार और भूगोल विषय के चार शिक्षक कार्यरत हैं. खास बात यह है कि भूगोल विषय में पहले से तीन शिक्षक मौजूद होने के बावजूद हाल ही में चौथे शिक्षक के रूप में जागेश्वर प्रसाद का पदस्थापन किया गया है. इसके पहले मई माह में ही अनिल कुमार का भी इसी विद्यालय में स्थानांतरण किया गया था. दोनों शिक्षक अंतर जिला स्थानांतरण के माध्यम से हजारीबाग पहुंचे हैं. हालांकि गर्मी की छुट्टियों के कारण जागेश्वर प्रसाद का योगदान अभी लंबित है, लेकिन उनकी तैनाती ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

पदस्थापन और प्रतिनियुक्ति पर उठ रहे सवाल

शिक्षा विभाग के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि प्रतिनियुक्ति और पदस्थापन की प्रक्रिया में लंबे समय से अनियमितताएं चल रही हैं. आरोप यह भी है कि शहर के सुविधाजनक और प्रतिष्ठित विद्यालयों में पदस्थापन के लिए प्रभाव और पैसे का इस्तेमाल किया जाता है. यही वजह बताई जा रही है कि जिन विद्यालयों में पहले से पर्याप्त शिक्षक मौजूद हैं, वहां भी लगातार नए शिक्षकों की तैनाती हो रही है. दूसरी ओर दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में वर्षों से शिक्षक रिक्त पदों की समस्या बनी हुई है. यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह न केवल प्रशासनिक व्यवस्था बल्कि शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है.

हजारीबाग के दूसरे सरकारी स्कूलों की क्या है स्थिति

सीआरपी स्तर से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार शहर के कई अन्य विद्यालयों में भी शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात बेहद कम है. पुलिस लाइन स्थित श्रीकृष्ण आरक्षी उच्च विद्यालय में 139 विद्यार्थियों पर 11 शिक्षक कार्यरत हैं. यहां लगभग 12 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक उपलब्ध है. इसी प्रकार विनोबा भावे विश्वविद्यालय के समीप स्थित उत्क्रमित उच्च विद्यालय सिंदूर में 260 विद्यार्थियों पर 21 शिक्षक कार्यरत हैं. यहां भी औसतन 12 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक मौजूद है. सीएम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस बालक, जो पहले जिला स्कूल के नाम से जाना जाता था, वहां 490 विद्यार्थियों पर 30 शिक्षक कार्यरत हैं. यहां 16 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक का अनुपात है. इसके अलावा, बिहारी बालिका उच्च विद्यालय और पीएम श्री केबी हाई स्कूल में लगभग 23 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक उपलब्ध हैं. वहीं प्लस टू हिंदू उच्च विद्यालय में 1060 विद्यार्थियों पर 36 शिक्षक कार्यरत हैं, जहां 29 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक की व्यवस्था है.

ग्रामीण स्कूलों में अब भी शिक्षक की भारी कमी

जहां शहर के विद्यालयों में शिक्षकों की संख्या आवश्यकता से अधिक दिखाई दे रही है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों की तस्वीर पूरी तरह अलग है. जिले के कई गांवों में संचालित स्कूलों में एक शिक्षक को 50 से 60 या उससे अधिक विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है. शिक्षकों की कमी के कारण कई विद्यालयों में विषयवार पढ़ाई प्रभावित होती है. कई बार एक ही शिक्षक को अलग-अलग विषयों की कक्षाएं लेनी पड़ती हैं. इसका सीधा असर विद्यार्थियों की शैक्षणिक गुणवत्ता पर पड़ता है.

रैशनलाइजेशन से निकल सकता है समाधान

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षकों का रैशनलाइजेशन यानी युक्तिकरण सही तरीके से लागू किया जाए तो जिले के अधिकांश विद्यालयों में शिक्षक संकट को काफी हद तक दूर किया जा सकता है. उनका कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में उपलब्ध संसाधनों का संतुलित उपयोग नहीं हो रहा है. जहां जरूरत कम है वहां शिक्षक अधिक हैं और जहां आवश्यकता अधिक है वहां पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं. ऐसी स्थिति में शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है.

उपायुक्त ने मांगी रिपोर्ट

इस पूरे मामले पर हजारीबाग के उपायुक्त हेमंत सती ने कहा है कि मामला उनके संज्ञान में है. उन्होंने संबंधित अधिकारियों को विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात का आकलन कर रैशनलाइजेशन संबंधी रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया है. उपायुक्त के अनुसार रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी ताकि सभी विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता संतुलित की जा सके और विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिल सके.

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शिक्षा विभाग के सामने बड़ा सवाल

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार ने 40 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक का स्पष्ट मानक निर्धारित किया है तो फिर कुछ शहरी विद्यालयों में सात से 12 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक कैसे उपलब्ध है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में एक शिक्षक पर 60 से अधिक विद्यार्थियों की जिम्मेदारी है. यदि शिक्षा विभाग समय रहते इस असंतुलन को दूर नहीं करता तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य प्रभावित होगा और सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के प्रयास केवल कागजी दावों तक सीमित होकर रह जाएंगे.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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