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Home झारखण्ड गुमला गुमला के इस गांव में न चलने को सड़क और न पीने को पानी, इलाज भगवान भरोसे

गुमला के इस गांव में न चलने को सड़क और न पीने को पानी, इलाज भगवान भरोसे

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गुमला के इस गांव में न चलने को सड़क और न पीने को पानी, इलाज भगवान भरोसे
लाधुडेरा गांव की समस्याओं के बारे में जानकारी देते ग्रामीण शानु साहू. फोटो: प्रभात खबर

गुमला से जगरनाथ पासवान की रिपोर्ट

Gumla Ground Report: झारखंड के गुमला जिले के पालकोट प्रखंड के बिलिंगबिरा पंचायत में लाधुडेरा गांव है. इस गांव में न चलने के लिए सड़क है. न पीने के लिए पानी है. नदी का पझरा पानी पीते हैं. इलाज की भी कोई व्यवस्था नहीं है. आजादी के 77 साल बाद भी लाधुडेरा गांव की यह हकीकत सरकार और प्रशासनिक काम के दावों की पोल खोल रही है. गांव के लोग पूछ रहे हैं कि विधायक, सांसद और जिले के अधिकारी कहां हैं?

नक्सलवाद खत्म होते ही प्रशासन ने मोड़ा मुंह

विकास के जो वादे किये जा रहे हैं, उसका विद्रुप चेहरा लाधुडेरा गांव है. यहां के लोग आज भी संकट में जी रहे हैं. यह गांव एक समस्या नक्सल से जूझ रहा था. नक्सल के डर से अधिकारी गांव नहीं जाते थे. परंतु, अब पुलिस की दबिश से इलाका शांत हो गया है. नक्सल भी खत्म हो गया है. नक्सल खत्म होने के बाद प्रशासन ने मुंह मोड़ लिया है. ग्रामीणों ने कहा है कि गांव में सड़क नहीं है. बीमार व गर्भवती महिलाओं को खटिया में लादकर अस्पताल लाया जाता है.

गांव की चार प्रमुख समस्या

  • पानी की समस्या: गांव में पीने का पानी चुआं और डाड़ी है. गर्मी में सूख गया है. अभी नदी का पानी पी रहे हैं. सरकार की तरफ से पानी की व्यवस्था नहीं की गयी है.
  • बिजली की समस्या: सरकार का दावा है. हर गांव में बिजली है. लेकिन लाधुडेरा गांव में आजादी के 77 साल बाद भी बिजली नहीं पहुंची है. गांव में सोलर लगा था. वह कुछ साल पहले खराब हो चुका है.
  • सड़क की समस्या: गांव में मुख्य सड़क नहीं है. जिससे की ग्रामीणों को आने जाने में बहुत समस्या का सामना करना पड़ता है. बरसात के दिनों में गांव के लोगों को गांव तक ही सहमित रहना पड़‌ता है.
  • स्वास्थ्य की समस्या: गांव में इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है. अगर कोई बीमार हो जाये तो इलाज के अभाव में कई लोगों की जान जा चुकी है. इसलिए हर सप्ताह एक नर्स गांव में कैंप करें.

क्या कहते हैं ग्रामीण

ग्रामीण शानु साहू ने कहा कि लाधुडेरा गांव में समस्या भरी पड़ी है. समस्याओं के कारण जनजीवन पूरी तरह प्रभावित है. पूर्व में भी बड़ी घटना हो चुकी है. इसलिए जनहित में गांव की समस्याओं का शीघ्र संज्ञान लेकर उसका समाधान किया जाये.

अनिता देवी ने कहा कि लाधुडेरा गांव के लोग संकट में जी रहे हैं. नक्सलवाद खत्म हुआ तो अब गांव के विकास से प्रशासन ने मुंह मोड़ लिया है. प्रशासन से अनुरोध है. गांव की समस्याओं को दूर करने की पहल करें. सड़क व पानी की समस्या का निदान हो.

लीली कुमारी ने बताया कि गांव में पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है. कुआं सूख गया है. अभी लोग गांव से सटे नदी का पझरा पानी पीते हैं. सड़क की भी व्यवस्था नहीं है. कई बार समस्या दूर करने की मांग की गयी. लेकिन अधिकारी इस तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं.

बरसात में बीमार हुए, तो मरना निश्चित है. क्योंकि, गांव तक गाड़ी नहीं जाती है. मरीज को खटिया में लादकर गांव से निकाला जात है. मुख्य सड़क तक आते आते मरीज की स्थिति नाजुक हो जाती है. ऐसे में कई मरीजों की जान जा चुकी है.
प्रमिला देवी, ग्रामीण

बादल प्रधान ने कहा कि छह माह तक गांव में टापू में रहना पड़‍ता है. क्योंकि, गांव में सड़क की कोई व्यवस्था नहीं है. गर्मी के मौसम में किसी प्रकार आते जाते हैं. लेकिन बरसात में आना जाना बंद हो जाता है. ग्रामीणों को काफी परेशानी झेलनी पड़‍ती है.

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सरस्वती देवी ने कहा कि गांव में पानी, सड़क व स्वास्थ्य की प्रमुख समस्या है. लाधुडेरा गांव की समस्याओं को दूर करने के लिए कई बार उपायुक्त को आवेदन सौंपा है. लेकिन आज तक उपायुक्त के स्तर से समस्या दूर करने की पहल नहीं हो रही है.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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