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Home झारखण्ड गोड्डा धनरोपनी की नहीं पकड़ पायी है रफ्तार, असिंचित इलाके के किसानों में मायूसी

धनरोपनी की नहीं पकड़ पायी है रफ्तार, असिंचित इलाके के किसानों में मायूसी

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धनरोपनी की नहीं पकड़ पायी है रफ्तार, असिंचित इलाके के किसानों में मायूसी

गोड्डा. राज्य के कम वर्षा वाले जिलों में गोड्डा पहले स्थान पर है. अब तक यहां संतोषजनक वर्षा नहीं हुई है. छिटपुट बारिश से किसानों को कोई विशेष लाभ नहीं मिल रहा है. वे किसी तरह धनरोपनी में जुटे हैं. अच्छी बारिश नहीं होने से खेती की रफ्तार धीमी है. मौसम वैज्ञानिक रजनीश के अनुसार, 1 जून से अब तक जिले में सामान्य वर्षापात 427 मिमी होना चाहिए था, जबकि अब तक केवल 340 मिमी वर्षा दर्ज की गयी है, जो सामान्य से 20 प्रतिशत कम है. जून और जुलाई दोनों महीनों में सामान्य वर्षा नहीं हुई. जुलाई अब समाप्ति के कगार पर है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गयी है. अब तक हुई वर्षा से केवल मिट्टी में थोड़ी नमी आयी है, लेकिन खेतों में पर्याप्त पानी नहीं भर पाया है. धान की बुआई के लिए खेतों में भरपूर पानी की आवश्यकता होती है. सिंचाई साधनों की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में किसान जैसे-तैसे बुआई कर पा रहे हैं, लेकिन जहां सिंचाई की सुविधा नहीं है, वहां अब तक बुआई नहीं हो पायी है. गौरतलब है कि जिले में खेती मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर है. मानसून बेहतर हो तो अच्छी फसल होती है, अन्यथा किसान धान की बुआई ही नहीं करते. हाल के वर्षों में असमान बारिश का प्रचलन बढ़ा है. कुछ क्षेत्रों में जोरदार वर्षा होती है, तो कुछ में बेहद कम. इस बार भी यही स्थिति देखी जा रही है. जिले के पोड़ैयाहाट प्रखंड में अपेक्षाकृत अच्छी वर्षा हुई है, जिससे वहां किसानों ने संतोषजनक ढंग से खेती की है. जबकि बोआरीजोर, महगामा, गोड्डा, बसंतराय और पथरगामा प्रखंडों में कम वर्षा हुई है. पिछले वर्ष जुलाई के अंत में संतोषजनक वर्षा होने के कारण धानरोपनी तेजी से हुई थी. लेकिन इस बार जुलाई का महीना समाप्ति की ओर है. अब तक सामान्य से भी कम वर्षा हुई है. केवल 51% सिंचित भूमि पर ही हो पायी धान की बुआई कमजोर मानसून का असर यह है कि अब तक जिले में केवल 51% सिंचित भूमि पर ही धान की बुआई हो सकी है. जिले में 51,500 हेक्टेयर भूमि पर धान, 1,200 हेक्टेयर में मक्का और लगभग 21,000 हेक्टेयर सिंचित भूमि पर दलहन की बुआई का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन वर्षा की कमी किसानों के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गयी है. पिछले 8-10 वर्षों में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव जिले में साफ दिखाई दिया है. इस दौरान गोड्डा ने दो बार गंभीर सूखे की स्थिति का सामना किया है. लगभग दो वर्ष पूर्व की स्थिति तो बेहद भयावह थी. वैज्ञानिक मोटे अनाज की खेती पर दे रहे जोर हाल के वर्षों में जिले में मानसून की स्थिति संतोषजनक नहीं रही है. इसे देखते हुए कृषि वैज्ञानिक और विभाग मोटे अनाज (जैसे मडुआ, कोदो आदि) की खेती को बढ़ावा दे रहे हैं. किसानों को इस दिशा में आर्थिक सहायता भी दी जा रही है. राज्य सरकार ने मडुआ की खेती के लिए प्रति हेक्टेयर 3,000 रुपये की सहायता राशि देने की घोषणा की है. बावजूद इसके, किसानों की जागरुकता बेहद कम है. वे अब भी परंपरागत फसलों की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं, जो अधिक जल की मांग करती हैं.

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