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महंगे दरों में खरीदना पड़ता है आलू बीज

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महंगे दरों में खरीदना पड़ता है आलू बीज

भले ही किसानों ने खेती पर जोर दिया है, लेकिन कोल्ड स्टोरेज नहीं होने की वजह से किसानों को महंगे दरों पर बीज खरीदना पड़ता है. अभी ज्यादातर लोग आलू अपने खेतों में लगाये हैं और महंगे दर पर बीज की खरीदारी की है. कुछ किसानों का आलू तैयार भी हो गया है और इस माह दूसरी बार लगाये हैं. बता दें कि प्रखंड क्षेत्र में आलू की खेती बड़े पैमाने पर होने लगी है. पहले लोग अपने लिए एक-दो कट्ठा में उपजाते थे, लेकिन अब किसान कई एकड़ में उपजाने लगे हैं. किसान जयदेव सिंह, राजेंद्र राम, बबलू हांसदा, छेदी प्रसाद यादव, अनिल कुमार, सत्यनारायण पंडित सहित अन्य किसान बताते हैं कि इस साल करीब 100 एकड़ जमीन में आलू की खेती लगाये है. लेकिन समस्या है कि उपज को स्टोर करने के लिए कोल्ड स्टोरेज की सुविधा नहीं है. इलाके के किसानों को आलू को स्टोर करने के लिए जिला मुख्यालय या अन्य जिलों के कोल्ड स्टोरेज पर निर्भर रहना पड़ता है. उपज के बाद न सिर्फ स्थानीय बाजार बल्कि अन्य जगहों पर जाना पड़ता है. पसय गांव से शुरू हुए आलू की खेती आज प्रखंड के सकरी, हरियारी, कुसाहा, जीतपुर, केंदुआ अम्ववार, पिंडराहट आदि गांव तक बड़े पैमाने पर आलू की खेती कर किसान खुशहाल हैं.

पश्चिम क्षेत्र में होती है ज्यादा आलू की खेती

किसान बताते हैं कि अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर में आलू की रोपाई होती है. प्रखंड क्षेत्र में लगभग 100 एकड़ जमीन में आलू की खेती हो रही है. बड़े पैमाने पर आलू की खेती होने से मजदूरों को भी अतिरिक्त काम मिलता है. आलू की खेती में एक बीघा जमीन में तकरीबन 40 मजदूर लगता है. प्रत्येक बीघा में लगभग 10 हजार का उर्वरक लगता है और 20 पैकेट आलू का बीज लगता है, जिसकी कीमत 30 से 40 हजार रुपये आती है. प्रत्येक बीघे में करीब 200-250 पैकेट आलू का उत्पादन होता है. लगभग 70 से 80 हजार की आमदनी होती है. क्षेत्र में धीरे-धीरे अच्छी पैदावार होने के बाद किसानों का रुझान बढ़ता गया. हालांकि प्रखंड मुख्यालय में शीत भंडार नहीं रहने के कारण किसानों को आलू के रखरखाव में परेशानी रही है.

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