मुनि श्री ने कहा कि विराम में ही वास्तविक आराम छिपा है. मनुष्य प्रायः अपने अशांत और बेचैन जीवन का कारण किसी व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति अथवा निमित्त को मानता है. वह सोचता है कि अमुक व्यक्ति उसके आराम में बाधा डाल रहा है या कोई परिस्थिति उसके सुख को छीन रही है, जबकि वास्तविक समस्या बाहर नहीं, बल्कि हमारी दृष्टि और अंतहीन दौड़ में है. उन्होंने कहा कि जब तक मन निरंतर भाग-दौड़, अधिक पाने की इच्छा और तृष्णा में उलझा रहेगा, तब तक जीवन में आराम संभव नहीं है. यदि सच्चा आराम चाहिये, तो जहां हो, जैसे हो, जितने में हो, उसमें विराम लेना सीखो. जहां विराम है, वहीं आराम है. मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य जितना अधिक प्राप्त करता है, उसकी इच्छाएं उतनी ही बढ़ती जाती हैं, इसलिए बाहरी उपलब्धियों में कभी स्थायी शांति नहीं मिल सकती. वास्तविक विश्राम भीतर है. जब मन अपनी अनंत प्यास को रोककर स्वयं में ठहरना सीखता है, तभी जीवन में सच्चा आराम प्राप्त होता है.