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त्याग, तपस्या, संयम का प्रतीक थे भरत : स्वामी हंसानंद

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त्याग, तपस्या, संयम का प्रतीक थे भरत : स्वामी हंसानंद

मसलिया. प्रखंड के तिलाबाद गांव स्थित गोपाल मंदिर प्रांगण में चले रहे नौ दिवसीय श्रीराम कथा में हरिद्वार से आए हुए स्वामी हंसानंद गिरी महाराज ने भरत चरित्र प्रसंग का विस्तृत वर्णन किया. भरत चरित्र के प्रसंग सुन श्रोता भावुक हो गये. कथाव्यास हंसानंद महाराज ने भरत के चरित्र को त्याग, तपस्या, भक्ति, श्रद्धा, आस्था व प्रेम का प्रतीक बताया. कहा कि स्वार्थ के कारण आज भाई-भाई जहां दुश्मन जैसा व्यवहार करते हैं, वहीं में त्याग, संयम, धैर्य और ईश्वर प्रेम भरत चरित्र का एक उदाहरण है. भरत ने अपने भाई के प्रेम में सब कुछ त्याग देने की प्रतिज्ञा ले ली. कहा कि श्रीराम के वनवास के पश्चात भरत के अयोध्या पहुंचते ही अयोध्या वासी भरत को राजा के रूप में स्वीकार नहीं करते हुए तिरस्कार किया. तिरस्कार का कारण जब भरत ने अपनी मां कैकयी से पूछा तो कैकयी ने बताया कि श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास एवं तुमको अयोध्या का राजा बनाया गया है. इतना सुनते ही भरत अपने बड़े भाई श्रीराम की खोज में निकल पड़ते हैं. श्रीराम से जंगल मे मुलाकात भी होती है. साथ ही भरत उनसे अयोध्या लौटने के लिए काफी विनती भी करते हैं. परंतु श्रीराम अपने पिता की आज्ञा का उल्लंघन होने की बात कहकर भरत को अयोध्या लौटकर राज्य संभालने की बात कहते हैं. तब भरत श्रीराम की चरण पादुका अपने सिर पर लेकर राम भक्त ले चला रे राम की निशानी.. कहते हुए अयोध्या वापस लौट जाते हैं. भरत चरित्र की कथा सुन श्रोता भावुक हो गए. स्वामी हंसानन्द गिरी ने भरत चरित्र की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि आजकल एक इंच ज़मीन के लिए कोर्ट तक लड़ाई होती है, पर राम ने भरत के लिए अपने अधिकार का राज्य छोड़ दिया और भरत ने भी उस राज्य को अपने बड़े भाई को वापस लौटा दिया. उक्त प्रसंग पर कई झांकियां प्रस्तुत की गयी. इस अवसर पर पूर्व मंत्री सत्यानन्द झा बाटुल ने कथा व्यास से आशीर्वाद प्राप्त किया.

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