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Home झारखण्ड दुमका दुमका में काठीकुंड के आदिवासी-पहाड़िया गांवों में बूंद-बूंद को तरस रहे लोग, झरने और कुएं के भरोसे कटी गर्मी

दुमका में काठीकुंड के आदिवासी-पहाड़िया गांवों में बूंद-बूंद को तरस रहे लोग, झरने और कुएं के भरोसे कटी गर्मी

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दुमका में काठीकुंड के आदिवासी-पहाड़िया गांवों में बूंद-बूंद को तरस रहे लोग, झरने और कुएं के भरोसे कटी गर्मी
मजडीहा में बंद पड़ा जलमीनार

दुमका से अभिषेक की रिपोर्ट

Dumka Water Crisis, दुमका : झारखंड के दुमका जिले अंतर्गत काठीकुंड प्रखंड की बिछियापहाड़ी पंचायत में पेयजल संकट (Water Crisis) गहराता जा रहा है. विशेषकर आदिवासी और आदिम जनजाति (पहाड़िया) बहुल गांवों में रहने वाले लोगों के लिए इस चिलचिलाती गर्मी में बूंद-बूंद पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है. पंचायत के कई गांवों में लगे चापानल और लाखों की लागत से बनी सोलर जलमीनारें वर्षों से सफेद हाथी बनकर खराब पड़ी हैं. प्रशासन की बेरुखी के कारण ग्रामीण दूषित कुओं और प्राकृतिक झरनों का पानी पीने को मजबूर हैं.

बंदोबेड़ा: 1 कुएं के भरोसे 20 परिवार

बिछियापहाड़ी पंचायत के आदिवासी बहुल बंदोबेड़ा गांव में 20 से अधिक परिवार रहते हैं. गांव में पेयजल आपूर्ति के लिए तीन चापानल (Handpumps) लगाए गए थे, लेकिन विभागीय लापरवाही के कारण तीनों वर्षों से खराब पड़े हैं. मरम्मत न होने की वजह से पूरे गांव की प्यास बुझाने का जिम्मा अब एकमात्र कुएं पर टिक गया है. ग्रामीणों ने बताया कि सुबह से लेकर रात तक इसी कुएं से पीने, खाना बनाने और मवेशियों के लिए पानी जुटाना पड़ता है. गर्मी बढ़ने के कारण कुएं का जलस्तर काफी नीचे चला गया है, जिससे मुश्किलें और बढ़ गई हैं.

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तालडी: पहाड़िया गांव में एक भी चालू चापानल नहीं

लगभग 15 परिवारों वाले आदिम जनजाति पहाड़िया बहुल तालडी गांव की स्थिति और भी भयावह है. इस गांव के भीतर एक भी चालू चापानल नहीं है. ग्रामीण पानी के लिए गांव से बाहर स्कूल के समीप स्थित एक चापानल पर निर्भर हैं, लेकिन वह भी इतनी जर्जर स्थिति में है कि घंटों मशक्कत के बाद ही थोड़ा-बहुत पानी उगल पाता है. गांव में स्थापित एकमात्र सोलर जलमीनार भी सालों से बंद है. मजबूरी में महिलाओं और बच्चों को चिलचिलाती धूप में प्रतिदिन कई किलोमीटर पैदल चलकर दूर स्थित कुओं से पानी ढोना पड़ रहा है.

मजडीहा: दो-दो सोलर जलमीनारें खराब

इसी पंचायत के मजडीहा गांव में भी पेयजल व्यवस्था पूरी तरह बदहाल है. यहां ग्रामीणों को नल से जल देने के लिए दो-दो सोलर जलमीनारें स्थापित की गई थीं, लेकिन देखरेख के अभाव में दोनों लंबे समय से बंद हैं. जलमीनारों के ठप होने से परेशान ग्रामीण अब प्राकृतिक जलस्रोतों (झरने और चुआं) से पानी लाकर अपनी जरूरतें पूरी कर रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि दूषित और असुरक्षित पानी पीने की वजह से गांव में हमेशा जलजनित बीमारियों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा मंडराता रहता है.

प्रतिनिधियों से सिर्फ मिला आश्वासन

स्थानीय ग्रामीणों ने रोष जताते हुए कहा कि पेयजल के इस बड़े संकट से संबंधित विभाग के अधिकारियों और क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों को कई बार लिखित और मौखिक रूप से अवगत कराया गया है, लेकिन चुनाव बीतने के बाद कोई सुध लेने नहीं आता. ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से अविलंब संज्ञान लेते हुए खराब पड़े चापानलों और सोलर जलमीनारों को दुरुस्त कराने तथा गांवों में स्थायी पेयजल व्यवस्था बहाल करने की गुहार लगाई है. लोगों का कहना है कि अगर जल्द समाधान नहीं हुआ, तो गर्मी के बाद आने वाले बरसात के मौसम में यह समस्या और विकराल रूप ले लेगी.

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समीर उरांव, डिजिटल मीडिया में सीनियर जर्नलिस्ट हैं और वर्तमान में प्रभात खबर.कॉम में सीनियर कटेंट राइटर के पद पर हैं. झारखंड, लाइफ स्टाइल और स्पोर्ट्स जगत की खबरों के अनुभवी लेखक समीर को न्यूज वर्ल्ड में 5 साल से ज्यादा का वर्क एक्सपीरियंस है. वह खबरों की नब्ज पकड़कर आसान शब्दों में रीडर्स तक पहुंचाना बखूबी जानते हैं. साल 2019 में बतौर भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता करने के बाद उन्होंने हिंदी खबर चैनल में बतौर इंटर्न अपना करियर शुरू किया. इसके बाद समीर ने डेली हंट से होते हुए प्रभात खबर जा पहुंचे. जहां उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग और वैल्यू ऐडेड आर्टिकल्स लिखे, जो रीडर्स के लिए उपयोगी है. कई साल के अनुभव से समीर पाठकों की जिज्ञासाओं का ध्यान रखते हुए SEO-ऑप्टिमाइज्ड, डेटा ड्रिवन और मल्टीपल एंगल्स पर रीडर्स फर्स्ट अप्रोच राइटिंग कर रहे हैं.
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