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Home झारखण्ड दुमका खेतों में पुआल जलाये जाने से पर्यावरण को नुकसान

खेतों में पुआल जलाये जाने से पर्यावरण को नुकसान

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खेतों में पुआल जलाये जाने से पर्यावरण को नुकसान

खेल में पुआल जलाने की परंपरा प्रभावित होगी उर्वरा शक्ति : बीएओ प्रतिनिधि, रानीश्वर प्रखंड क्षेत्र के कई गांवों में किसान हार्वेस्टर से धान की कटनी करा रहे हैं. मशीन से फसल झाड़ने के बाद पुआल का ढेर खेतों या सड़क किनारे जमा हो जाता है. किसान पुआल को बेकार समझकर आग लगा देते हैं, जिससे खेतों की मिट्टी के साथ-साथ आसपास के पेड़ों को भी नुकसान पहुंच रहा है. कई स्थानों पर पेड़ों के पास पुआल जलाने से बड़े-बड़े पेड़ झुलस गये हैं. जानकारों का कहना है कि पुआल जलाने से न केवल वायु प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता भी कम होती है. मिट्टी में मौजूद उपकारी कीट, जो भूमि को भुरभुरा और उपजाऊ बनाते हैं, आग में नष्ट हो जाते हैं. इसका सीधा प्रभाव फसल उत्पादन पर पड़ता है. पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्र में हार्वेस्टर से कटनी का चलन तेजी से बढ़ा है. किसान बताते हैं कि हल-बैल की जगह अब ट्रैक्टर का उपयोग हो रहा है. मवेशी पालने की परंपरा भी घट रही है. इस कारण घरों में पुआल की जरूरत नहीं रह गयी है. इसलिए किसान पुआल को खेत में छोड़कर बाद में जला देते हैं. प्रभारी प्रखंड कृषि पदाधिकारी प्रदीप कुमार कोठरीवाल ने कहा कि खेतों में सीमित मात्रा में राख हानिकारक नहीं होती, लेकिन पुआल का ढेर जलाना गलत है. उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि पुआल जलाने की प्रथा बंद करें. इसके बेहतर विकल्प अपनाएं.

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