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Home झारखण्ड धनबाद DHANBAD NEWS : बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज के बिना आज भी अधूरा लगता है महालया

DHANBAD NEWS : बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज के बिना आज भी अधूरा लगता है महालया

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DHANBAD NEWS : बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज के बिना आज भी अधूरा लगता है महालया

बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज के बिना बिना महालया आज भी अधूरा लगता है. बंगालियों के साथ ही अन्य समुदाय के भक्त भी महालया के दिन बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज में चंडी पाठ सुनना पसंद करते हैं. जब दुर्गा सप्तशती श्लोकों का पाठ उनकी आवाज में गूंजते हैं, तो ऐसा लगता है मां दुर्गा साक्षात दर्शन दे रहीं. हालांकि आज वह हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन उनकी आवाज में महिषासुर मर्दिनी सुनने के लिए भक्त सुबह चार बजे जग जाते हैं. जब बीरेंद्र कृष्ण भद्र कि आवाज गूंजती है, तो सभी नतमस्तक हो जाते हैं. ऑल इंडिया रेडियो, कोलकाता ने 1931 में महिषासुर मर्दिनी नामक दो घंटे का कार्यक्रम प्रसारित किया था. इसमें देवताओं की सभी शक्तियों के एकीकरण की प्रक्रिया के बाद देवी दुर्गा के अवतार और महिषासुर के साथ युद्ध में महिषासुर मर्दिनी के रूप में उनके उद्भव को दर्शाया गया है. 93 साल बाद भी बीरेंद्र कृष्ण भद्र का महिषासुर मर्दिनी हर महालया पर ऑल इंडिया रेडियो पर बजता है.

महालया के दिन मूर्तिकार बनाते हैं मां की आंखें :

महालया के दिन ही मूर्तिकार मां दुर्गा की आंखें बनाते हैं. देवी दुर्गा की प्रतिमा पर रंग चढ़ाया जाता है. मां दुर्गा की मूर्ति बनाने वाले कारीगर अपना कार्य पहले ही शुरू कर लेते हैं, लेकिन महालया के दिन मूर्ति को अंतिम रूप दिया जाता है. पितृपक्ष की तरह ही देवी पक्ष भी 15 दिन का होता है. इसमें 10 दिन नवरात्रि के होते हैं और 15वें दिन लक्ष्मी पूजा के साथ देवी पक्ष समाप्त हो जाता है अर्थात शरद पूर्णिमा के साथ देवी पक्ष समाप्त होता है.

मातृपक्ष समाप्ति व देवीपक्ष की शुरुआत का जयघोष है महालया : हरि भजन गोस्वामी

आद्या काली मंदिर कोयला नगर के पुजारी ने कहा कि अश्विन माह कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि को महालया आता है. पितृपक्ष का समापन व देवीपक्ष का आगमन महालया के साथ होता है. पितृपक्ष में देवता 15 दिनों के लिए अपना स्थान पित्तरो के लिए छोड़ देते हैं, महालया के दिन अपने स्थान पर वास करने लगते हैं. मातृपक्ष समाप्ति व देवीपक्ष की शुरुआत का जयघोष है महालया. एक समय था, जब घर की बेटी एक बार ससुराल के लिए विदा हो जाती थी, तो मायके नहीं आ पाती थी. मां का हृदय अपनी बेटी को देखने के लिए रो पड़ता था. इसी के प्रतिवाद में आतुर जननी ने जगतजननी से अपनी कन्या की कल्पना करके इस पुरुषतांत्रिक नियम का प्रतिवाद किया था. दुर्गा पूजा इसी की स्मृति है. दुर्गा पूजा बेटी के घर वापसी का उत्सव है. दुर्गा सप्तशती में ऋषि मुनियों ने स्तुति की है. ””स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु”” अर्थात जगत में जहां भी नारी मूर्ति है, वह महामाया का ही जीवंत विग्रह है. इसी को आधार मानते हुए बंगाली समुदाय ने बेटी के घर आने की खुशी को जाहिर करने के लिए आगोमनी गीतों की रचना की. इन्हीं गीतों व श्री दुर्गा सप्तशती के विशिष्ट श्लोकों का संकलन कर ऑल इंडिया रेडियो ने सन 1931 में महिषासुर मर्दिनी कार्यक्रम का प्रसारण शुरू किया, जो महालया के साथ इस प्रकार जुड़ गया कि महालया के प्रातः वीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज में चंडी पाठ सुनना एक परंपरा बन गयी है. महालया की सुबह जल्दी उठकर महिषासुर मर्दिनी सुनने व अपने पूर्वजों के लिए तर्पण करने के बाद देवी के आगोमनी की प्रस्तुति शुरू कर दी जाती है. हर तरफ देवी के आगमन का संदेश गूंजने लगता है, वातावरण में भक्ति का समावेश होने लगता है. उल्लासित मन से बड़े छोटे सभी माता के आने की प्रतीक्षा करने लगते हैं. माता दुर्गा अपने पुत्र गणेश कार्तिकेय व पुत्रियां लक्ष्मी सरस्वती के साथ अपने मायके पधारती हैं. ढाक ध्वनि, उलूक ध्वनि, घंटा ध्वनि व हर्षित मन से उनका स्वागत किया जाता है.

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