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देश की चुनिंदा शिव लिंगों में एक है ईचागढ़ का चतुर्मुखी शिव लिंग, लोगों की है अटूट आस्था

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देश की चुनिंदा शिव लिंगों में एक है ईचागढ़ का चतुर्मुखी शिव लिंग, लोगों की है अटूट आस्था
ईचागढ़ का चतुर्मुखी शिवलिंग

शचिंद्र कुमार दाश

Saraikela: जमशेदपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर टाटा-रांची राष्ट्रीय राजमार्ग-33 पर स्थित चौका मोड़ से यहां दायीं ओर करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर ईचागढ़ से लेपाटांड जाने के रास्ते पर है चतुर्मुखी शिव मंदिर. ईचागढ़ के छोटे से मंदिर में स्थापित है चतुर्मुखी शिव लिंग. यहां लोग बड़े ही भक्ति भाव के साथ भोलेनाथ की पूजा अर्चना करते है. बताया जाता है कि ईचागढ़ का चतुर्मुखी शिव लिंग देश के गिने चुने शिव लिंगों में एक है. लोग बताते है कि ऐसा ही एक शिव लिंग महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के तट पर है. ईचागढ़ के चतुर्मुखी शिव लिंग में चार मुंह है. चारों तरफ से देखने पर यह एक जैसा ही दिखता है.

इस शिव लिंग पर क्षेत्र के लोगों की भारी आस्था है. स्थानीय लोगों को विश्वास है कि बाबा के दरबार में मांगी हुई हर मुराद पूरी होती है. चतुर्मुखी शिव मंदिर में पूजन दर्शन के लिए आस-पास के लोगों के साथ-साथ बाहर से भी श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं. वहीं, शिवरात्रि में शिवलिंग पर जलार्पण करने के लिए भी यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है.

कई रहस्य समेटे है ईचागढ़ का चतुर्मुखी शिव लिंग

यह चतुर्मुखी शिवलिंग क्षेत्र कई रहस्यों को समेटे हुए है. ईचागढ़ के चतुर्मुखी शिव लिंग की स्थापना कब हुई थी और यह ऐतिहासिक शिव लिंग किस सदी का है, इसके पुख्ता प्रमाण नहीं हैं. क्षेत्र के लोग बताते है कि संभवत: ईचागढ़ रियासत के राजा विक्रमादित्य ने अपने शासनकाल में चतुर्मुखी शिव मंदिर बनाया था. क्षेत्र के लोगों का भी कहना है कि राजा विक्रमादित्य ने चतुर्मुखी शिव मंदिर के साथ-साथ आसपास के क्षेत्र में कई धरोहर बनवाए थे. इनका भग्नावशेष आज भी ईचागढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिलता है.

इस शिव लिंग की स्थापना कब हुई थी, यह पता नहीं चल सका. यहां ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से एक छोटे मंदिर का निर्माण कराया है. इस ऐतिहासिक चतुर्मुखी शिव मंदिर को कई बार धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग उठी, परंतु अब तक मांग पूरी नहीं हो सकी.

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