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Bokaro News : इलेक्ट्रॉनिक लाइटों ने किया दीये से दूर

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Bokaro News : इलेक्ट्रॉनिक लाइटों ने किया दीये से दूर

बेरमो, बेरमो में लगभग सवा डेढ़ सौ साल पहले कई कुम्हार परिवार जरीडीह बाजार में आकर बसे थे. इसमें कुछ गिरिडीह, तो कुछ गया जिले से आये थे. अभी भी जरीडीह बाजार में सैकड़ों कुम्हार परिवार हैं, जो पुश्तैनी धंधे को संभाले हुए हैं. कहते हैं जरीडीह बाजार में सबसे पहले गोपी पंडित आये थे. इनके बेटे बाड़ो कुम्हार व बाद में पौते मनोज पंडित तथा जवाहर पंडित ने इस काम को आगे बढ़ाया. बेरमो के अलावा गोमिया, चंद्रपुरा में भी सैकड़ों कुम्हार परिवार रह रहे हैं. जरीडीह बाजार के 77 वर्षीय जवाहर प्रजापति का कहना है कि अभी भी मिट्टी के दीये की कीमत अन्य सामग्री की तुलना में ज्यादा नहीं है. एक दशक पूर्व दीपावली के समय जितने दीये बेचते थे, अब एक तिहाई ही बिकते हैं. इलेक्ट्रॉनिक लाइट के कारण लोग मिट्टी के दीये से दूर हो रहे हैं. 18-19 की उम्र में वह गिरिडीह में अपने दादा से मिट्टी के बर्तन बनाने की कला सीख कर जरीडीह बाजार आये थे. आज भी सुबह से देर शाम तक चाक पर काम करते हैं. पत्नी बंदिया देवी का पूरा सहयोग मिलता है. तीनों पुत्र इस पुश्तैनी धंधे से नहीं, बल्कि अलग-अलग व्यवसाय से जुड़ गये हैं. एक समय दीपावली पर चारों ओर मिट्टी के दीये ही जगमगाते थे. छतों व चहारदीवारी पर करीने से जलते दीये सुकून देते थे. अब इनकी जगह बिजली के झालर और मोमबत्तियां लेती जा रही हैं. मिट्टी के दिये अब पूजा घरों और धार्मिक आयोजनों में सिमट कर रह गये हैं.

मिट्टी के बर्तनों का भी सिमट गया है उपयोग

आधुनिकता की दौड़ में मिट्टी के सामानों की मांग कम हुई तो कुम्हार परिवारों के समक्ष परंपरागत हुनर से जीविका चलाना मुश्किल होता गया. ऐसे में कुम्हार जाति की नयी पीढ़ी पुश्तैनी धंधे से दूर होती जा रही है. पहले दुकानों व होटलों में मिट्टी के बर्तन (कुल्हड़) में ही रसगुल्ला, दूध-दही व मट्ठा मिलता था और इसका स्वाद ही कुछ और था. कई नामी-गिरामी होटलों में भी मुर्गा व मीट भी कुल्हड़ में ही परोसा जाता थे. शादी-ब्याह सहित पूजा-पाठ के अलावा अन्य समारोहों में पानी पीने के लिए मिट्टी के गिलास का प्रयोग होता था. अब चाय की दुकानों को छोड़ कुल्हड़ कहीं भी नजर नहीं आता है. मिट्टी के अन्य बर्तनों का भी उपयोग सिमट गया है. अधिकतर दुकानों में चाय भी कागज व प्लास्टिक के कप में ही मिलती है.

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