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Supaul News : कोसी के पटेर से बनने वाली चटाई का अब मिटने लगा है वजूद

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Supaul News : कोसी के पटेर से बनने वाली चटाई का अब मिटने लगा है वजूद
सुपौल में पटेर से चटाई बनातीं महिलाएं.

Supaul News : बलराम/रौशन, सुपौल. कोसी का इलाका मूल रूप से कृषि अथवा कृषि आधारित धंधों पर ही निर्भर है. यहां की काश्तकारी केवल मिथिलांचल में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रदेश सहित देश में भी ख्याति प्राप्त है. लेकिन जनप्रतिनिधियों की उदासीनता कहें या प्रशासनिक बेरुखी, चटाई निर्माण का यह उद्योग अब दम तोड़ने लगा है. इससे इलाके के लोगों का रोजगार भी छिनता जा रहा है. एक जमाना था जब यहां की कास-पटेर से बनी सुंदर चटाइयों का निर्यात दूर के प्रदेशों में भी होता था. विशिष्ट कला से निर्मित इन चटाइयों का डिमांड दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कोलकाता सहित अन्य राज्यों में भी काफी अधिक था. लेकिन वक्त के बदलते दौर में काश्तकारी का यह धंधा अब मंदा हो चुका है. इस कार्य से जुड़े लोग भी अब अन्य विकल्पों की तलाश में जुटे हैं. हालांकि कुछ लोग अभी भी इस धंधे से जुड़े हुए हैं. ऐसे लोगों की उम्मीद भरी नजर सरकार पर टिकी है. सरकार व प्रशासन की पहल इस धंधे को जीवनदान दे सकती है.

कोसी की पहचान थी यहां की काश्तकारी

कोसी के कछार पर बहुतायत में उगने वाले पटेर से बनने वाली यह चटाई ना सिर्फ स्थानीय कला व संस्कृति की पहचान थी, बल्कि बड़े पैमाने पर निर्माण की वजह से यह उद्योग का रूप धारण करता जा रहा था. लेकिन आधुनिकीकरण के इस अंधे दौर में कास व पटेर के जंगल समाप्त होते गये. वहीं प्लास्टिक की सस्ती चटाई का चलन बढ़ने लगा. उस पर भी जनप्रतिनिधियों व प्रशासनिक अधिकारियों की उपेक्षा अलग. नतीजा है कि कोसी का मान बढ़ाने वाला यह उद्योग समाप्त होने के कगार पर खड़ाहै. समय रहते इस कला व निर्माण से जुटे लोगों को अगर अपेक्षित मदद नहीं की गयी, तो काश्तकारी का यह उद्योग बीते दिनों की बात हो जायेगा. वहीं वक्त रहते सरकार सजग हुई, तो हजारों लोगों के लिए रोजगार का जुगाड़ हो सकेगा.

निर्माण सामग्री जुटाना बनी है चुनौती

चटाई निर्माण के लिए कास व पटेर के अलावा रस्सी की मुख्य रूप से आवश्यकता होती है. लेकिन इस कारोबार से जुड़े लोगों के पास अब पैसे की भी किल्लत रहने लगी है. इस कारण पटेर व रस्सी की खरीद नहीं हो पाती है. चटाई निर्माण से जुड़े लोगों के लिए संसाधनों को जुटाना भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है. नतीजा है कि आवश्यक संसाधन के अभाव में उनके परिवार के सदस्य चाह कर भी चटाई नहीं बना पाते हैं. गौरतलब है कि पूर्व में तटबंध के गौरीपट्टी, बलथरवा, लगुनियां, सनपतहा, गोपालपुर, कटैया, शिहपुर, बनैनियां, भुलिया, सियानी, सदानंदपुर, गोपालपुर आदि गांवों में बड़े पैमाने पर चटाई का निर्माण होता था.पटेर की बहुतायत उपलब्धता के साथ ही वहां ग्रामीण स्तर पर रस्सी का निर्माण भी किया जाता था. लेकिन अब यह बीते दिनों की बात हो गयी है.

महंगा सौदा साबित हो रहा है चटाई का निर्माण

कोसी महासेतु निर्माण के वक्त गाइड बांध बना. इसके बाद पटेर के उत्पादन में कमी आने लगी. जाहिर है उत्पादन घटा तो पटेर की कीमतों में काफी उछाल आया. वहीं रस्सी के लिए भी बाजार का रुख करना पड़ताहै. दोनों सामग्रियों के महंगे होने के कारण चटाई निर्माण आसान नहीं रह गया है. वहीं अत्यधिक लागत के बावजूद बाजार में अपेक्षित मूल्य प्राप्त नहीं होने के कारण निर्माण कार्य में लगे लोग इस कार्य से किनारा करने लगे. कारोबार से जुड़ीसुगिया देवी, सुजान देवी, बुधिया देवी आदि बताती हैं कि एक दिन में प्रति महिला औसतन चार चटाई बना लेती है. लेकिन महंगे संसाधन से तैयार माल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है. इस कारण लंबे समय तक इस धंधे से जुड़ा रहना मुश्किल साबित हो रहा है.

परंपरा निर्वहन में आज भी जुटी हैं महिलाएं

कास व पटेर से चटाई निर्माण विशेष रूप से कोसी प्रभावित क्षेत्र के लोगों द्वारा की जाती थी. धंधा मंदा होने पर अधिकांश पुरुष रोजगार के लिए विभिन्न राज्यों की ओर पलायन करने लगे हैं. इनमें से कई महादलित परिवार व सरदार जाति के लोग पूर्वी कोसी तटबंध व स्परों पर बसे हुए हैं. इन जाति की महिलाओं द्वारा आज भी चटाई का निर्माण किया जाता है. हालांकि संसाधन के अभाव में यह चटाई निर्माण परंपरा का निर्वहन मात्र बन कर रह गया है. महादलित परिवार की महिलाएं बताती हैं कि निर्माण के लिए संसाधनों की उपलब्धता चुनौती बनती जा रही है. वही सरकारी स्तर से भी कोई सहायता नहीं मिल पा रही है. इस कारण कार्य करना मुश्किल हो रहा है. हालांकि तमाम परेशानियों के बावजूद यहां की चटाई बाहर बेची जा रही है. गर्मी के मौसम में चटाई की डिमांड बढ़ जाती है. जबकि बरसात के समय कारोबार मंदा हो जाता है.

विलुप्त होने के कगार पर एक कला

कोसी की स्पेशल घास जिसे बरुआ, पतहर, राणा, मूंज कहा जाता है, उसी कास-मूंज से बनी दौरी, बनौथी, मऊनी, डोलची, डलिया कभी मिथिलांचल की पहचान थी. लेकिन वर्तमान परिवेश में यह सब यादें रह गयी हैं. बरूआ (बल्ला) को देर तक भिंगोकर रखा जाता है, फिर इसे मनपसंद रंग से रंगा जाता था. उसके बाद विभिन्न आकृति की दौरी, बनौथी, डोलची, मौनी आदि बनायी जाती थी. गर्मी के समय दोपहर में खाली समय में महिलाएं डलिया बीनने का काम करती थीं. इस काम को प्रायः गांव की महिलाएं और लड़कियां किया करती थीं. लेकिन आधुनिकता के इस दौर में यह कला आगे नहीं बढ़ सकी. इस कारण नयी पीढ़ी अब कास-मूंज से सामान नहीं बना पाती. यही कारण है कि कोसी में यह कला अब विलुप्तप्राय हो चुकी है. सुपौल में चटाई का बहुत कम कारोबार हो रहा है.

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