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Home बिहार सुपौल युवाओं को बर्बादी की ओर धकेल रहा स्मैक

युवाओं को बर्बादी की ओर धकेल रहा स्मैक

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युवाओं को बर्बादी की ओर धकेल रहा स्मैक

युवाओं को शिक्षा, रोजगार व खेलकूद से जोड़कर ही स्मैक जैसे खतरनाक नशे पर लगाया जा सकता है रोक जदिया. शराबबंदी के बाद जिले में नशे का सबसे खतरनाक रूप स्मैक के रूप में सामने आया है. शराब पर रोक के बाद नशे का बाजार खत्म होने के बजाय स्मैक जैसे जानलेवा नशे की ओर शिफ्ट हो गया है. शहर से लेकर गांव तक स्मैक का नेटवर्क तेजी से फैल रहा है, जिसने न केवल कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है, बल्कि समाज की जड़ों को भी कमजोर कर दिया है. स्थानीय लोगों के अनुसार पहले जहां शराब का चलन अधिक था. वहीं अब स्मैक ने उसकी जगह ले ली है. स्कूल-कॉलेज के आसपास, चाय की दुकानों, ढाबों और सुनसान इलाकों में स्मैक की पुड़ियों की चोरी-छिपे बिक्री आम बात हो गई है. सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि किशोर और युवा वर्ग तेजी से इसकी गिरफ्त में आ रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि स्मैक बेहद खतरनाक और नशे की लत लगाने वाला पदार्थ है. इसके सेवन से शरीर धीरे-धीरे कमजोर होता है. मानसिक संतुलन भी बिगड़ जाता है. स्मैक की लत में फंसे कई युवा चोरी, छिनतई और लूट जैसी आपराधिक घटनाओं में शामिल हो रहे हैं. अभिभावकों का कहना है कि नशे के कारण बच्चों की पढ़ाई छूट रही है. उनका भविष्य अंधकार में डूबता जा रहा है. छोटी पुड़ियां, बड़ी चुनौती स्मैक की बिक्री छोटे-छोटे पैकेट और पुड़ियों में होने के कारण पुलिस के लिए यह बड़ी चुनौती बन गया है. तस्कर नए-नए तरीके अपनाकर स्मैक की आपूर्ति कर रहे हैं. शहर के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी इसकी पहुंच बढ़ चुकी है. पुलिस द्वारा समय-समय पर छापेमारी कर स्मैक बरामद की जा रही है. तस्करों की गिरफ्तारी भी हो रही है. लेकिन इसके बावजूद यह अवैध धंधा थमने का नाम नहीं ले रहा है. गांवों तक फैला स्मैक का जाल पहले स्मैक का कारोबार सीमित इलाकों तक सिमटा हुआ माना जाता था. लेकिन अब यह गांव-गांव तक फैल चुका है. युवा मजदूर, छात्र और बेरोजगार युवक इसकी चपेट में सबसे अधिक आ रहे हैं. सीमा क्षेत्र और बाहरी नेटवर्क की भूमिका के कारण स्मैक तस्करी पर पूरी तरह अंकुश लगाना प्रशासन के लिए कठिन साबित हो रहा है. जागरूकता और सख्ती दोनों जरूरी बुद्धिजीवियों का मानना है कि केवल पुलिस कार्रवाई से स्मैक की समस्या का समाधान संभव नहीं है. इसके लिए स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम, अभिभावकों की सतर्कता और समाज की सामूहिक भागीदारी जरूरी है. युवाओं को शिक्षा, रोजगार और खेलकूद से जोड़कर ही स्मैक जैसे खतरनाक नशे पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है. शराबबंदी के बाद स्मैक का बढ़ता चलन जिले के लिए गंभीर चेतावनी है. यदि समय रहते ठोस और सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो स्मैक आने वाली पीढ़ी को बर्बादी की ओर धकेल सकता है.

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