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Home बिहार सुपौल साइंस पार्क बनी शोभा की वस्तु, अधूरे कार्य व अव्यवस्था की खुलने लगी पोल

साइंस पार्क बनी शोभा की वस्तु, अधूरे कार्य व अव्यवस्था की खुलने लगी पोल

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साइंस पार्क बनी शोभा की वस्तु, अधूरे कार्य व अव्यवस्था की खुलने लगी पोल

सुपौल. जिले में पूर्व जिलाधिकारी द्वारा आरंभ किया गया ड्रीम प्रोजेक्ट ‘साइंस पार्क’ पर अब अभिभावकों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है. विज्ञान शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया यह महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट अनियमितता का प्रतीक बन गया है. पूर्व डीएम ने जिले के 50 राजकीय एवं राजकीयकृत प्रोजेक्ट उच्च माध्यमिक विद्यालयों में विज्ञान पार्क निर्माण के लिए मौखिक आदेश जारी किया था. आदेश के अनुसार, संबंधित विद्यालयों की संचित निधि से राशि खर्च कर साइंस पार्क का निर्माण किया जाना था. इसके लिए तत्कालीन डीपीओ (स्थापना) को नोडल पदाधिकारी नामित करते हुए समूचे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. बिना प्लानिंग का जारी हुआ आदेश उक्त प्रोजेक्ट की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह आदेश न तो साइंस पार्क के लिए आवश्यक भूमि चयन के बाद जारी किया गया था और न ही लागत के किसी स्पष्ट आकलन के साथ. नतीजतन, कई स्कूलों में हेडमास्टरों ने मनमानी करते हुए कहीं 05 लाख, कहीं 10 लाख तो कहीं 20 लाख तक खर्च कर दिए, बिना किसी मानकीकरण या गुणवत्ता नियंत्रण के निर्माण को कर दिया गया. लेकिन जिन्हें इसका लाभ मिलना चाहिए उसे इसका लाभ नहीं मिल रहा. सूत्रों के अनुसार, विज्ञान शिक्षकों ने भी इस अवसर का भरपूर लाभ उठाया. विभाग की ओर से किसी अधिकृत एजेंसी से मॉडल की आपूर्ति की व्यवस्था नहीं की गई. इसका फायदा उठाकर कई विज्ञान शिक्षकों ने मनमाने तरीके से मॉडल तैयार किए और विद्यालयों में आपूर्ति कर भुगतान प्राप्त कर लिया. समीक्षा के बावजूद नहीं दिया गुणवत्ता पर जोर हालांकि जिलाधिकारी एवं डीपीओ द्वारा समय-समय पर इस कार्य की समीक्षा की जाती रही, लेकिन किसी भी स्तर पर न तो तकनीकी प्राक्कलन तैयार किया गया और न ही कार्यान्वयन के लिए कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए. अब जब जिलाधिकारी का स्थानांतरण हो चुका है और डीपीओ खुद को जिम्मेदारी से मुक्त मान रहे हैं, तो परिणामस्वरूप अधिकांश विद्यालयों में साइंस पार्क की वास्तविकता सामने आने लगी है. नियोजन की कमी व जवाबदेही का अभाव बना बड़ा सवाल इस पूरे प्रकरण ने शिक्षा विभाग में योजना निर्माण और कार्यान्वयन में व्याप्त अनियमितताओं को उजागर कर दिया है. सवाल यह है कि बिना ठोस योजना, लागत आकलन और निगरानी के ऐसे प्रोजेक्ट की शुरुआत क्यों की गई? अब जब करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, तो जवाबदेही तय करने की जरूरत है. एचएम की है देखभाल की जबावदेही : डीपीओ डीपीओ एमडीएम महताब रहमानी ने कहा कि इस पूरी परियोजना में स्कूल की ही स्वतंत्रता थी, विभाग सिर्फ देख रही थी. इस परियोजना को स्कूल विकास मद से किया गया था. परियोजना काफी अच्छी है. बावजूद अगर कहीं इसका देखभाल नहीं किया जा रहा है तो यह एचएम की जबावदेही है.

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