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Home बिहार सुपौल देवोत्थान एकादशी आज : चार माह शयन के बाद योगनिद्रा से उठेंगे भगवान विष्णु, मांगलकि कार्य प्रारंभ

देवोत्थान एकादशी आज : चार माह शयन के बाद योगनिद्रा से उठेंगे भगवान विष्णु, मांगलकि कार्य प्रारंभ

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देवोत्थान एकादशी आज : चार माह शयन के बाद योगनिद्रा से उठेंगे भगवान विष्णु, मांगलकि कार्य प्रारंभ

सुपौल देवोत्थान एकादशी/देवउठनी एकादशी/देव उठान एकादशी इसी एकादशी के दिन जगत के पालनहार श्रीहरि भगवान विष्णु अपने योगनिद्रा से उठकर जागते हैं. मान्यता यह है कि आषाढ़ में हरिशयन एकादशी के दिन भगवान विष्णु निद्रा में प्रवेश कर कार्तिक मास के देवोत्थान एकादशी के दिन निद्रा से उठते हैं. भगवान विष्णु के निद्रा से उठते ही सनातन धर्म में सभी मांगलिक कार्यों का शुभारंभ भी हो जाता है. सदर प्रखंड के सुखपुर निवासी और देश के बेहद ही महनीय संस्थान काशी हिंदू विश्वविद्यालय में धर्म-विज्ञान की अध्ययन कर रहे छात्र विष्णु झा कहते हैं कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मानव की चेतना विष्णु की चेतना के साथ सुप्त हो जाती है. यही कारण है कि देवशयनी एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी की अवधि के चार मास में मनुष्यों की सुप्त चेतना को संयम के द्वारा समायोजित करने की परंपरा रही है. 12 नवंबर दिन मंगलवार को कार्तिक शुक्लपक्ष एकादशी के दिन चार मास से सोये हमारे भीतर विष्णु तत्व का जागरण होगा.

यह एकादशी करना सभी सनातन धर्माविलंबियों का कर्तव्य

देवोत्थान एकादशी को स्नान, व्रत, दान, पूजा, तप, जप करना प्रत्येक सनातनधर्मी का आध्यात्मिक कर्तव्य है. यह एकादशी व्रत सर्व मनोकामना पूर्ति करता है. एकादशी-माहात्म्य के अनुसार देवोत्थान एकादशी व्रत करने से एक हजार अश्वमेध यज्ञ तथा सौ राजसूय यज्ञों का फल मिलता है. इस परमपुण्यप्रदा एकादशी के विधिवत व्रत से सब पाप भस्म हो जाते हैं तथा व्रती मरणोपरांत बैकुंठ जाता है. इस एकादशी के दिन भक्त श्रद्धा के साथ जो कुछ भी जप-तप, स्नान-दान, करते हैं, वह सब अक्षय फलदायक हो जाता है. इस एकादशी को निराधार व्रत करने पर सीधे भगवान विष्णु का सानिध्य बैकुंठ में मिलता है और रात्रि जागरण करते हुए द्वादशाक्षर मंत्र का जाप करने पर अमोघ पुण्य की प्राप्ति होती है.

भगवान विष्णु के विग्रह शालिग्राम की महत्ता

झा कहते हैं कि इस दिन एकादशी के संध्या में शालिग्राम भगवान का विशेष पूजन होता है. गुड़ में गाय के दूध को डालकर उस दूध से भगवान का अभिषेक किया जाता है और मिथिलांचल में इसी दिन से गेंदा पुष्प जिसे शारद्य पुष्प कहा जाता है. इस पुष्प को भगवान विष्णु पर प्रथम अर्पित करके सभी देवी-देवताओं के लिए आज से ही यह पुष्प चढ़ना शुरू होता है. साथ ही शालिग्राम जो कि भगवान विष्णु का साक्षात विग्रह है, विशेष पूजन के अंतर्गत नवीन वस्त्र अर्पित किए जाते हैं. विभिन्न तरह की मौसमी फल, सब्जियों और साग का भी भोग लगाया जाता है. मखान, द्राक्ष, ईंख, अनार, केला, सिंघाड़ा, अलुहा, सुथनी आदि ऋतुफल श्री हरि को अर्पण की जाती है. तत्पश्चात् भगवान विष्णु के विग्रह स्वरूप शालिग्राम शिला को विधिवत पूजन करके पीढ़ी पर दीपक जला करके और शंख-घड़ियाल, घंटा इत्यादि बजा कर, उस पीढ़ी को ऊपर उठाकर भगवान विष्णु को जगाने की परंपरा को निभाया जाता है. इसके बाद चरणामृत अवश्य ग्रहण किया जाता है. ऐसा माना जाता है कि चरणामृत सभी रोगों का नाश कर अकाल मृत्यु से रक्षा करता है.

एकादशी तिथि प्रारंभ

स्थानीय पंचांगों का हवाला देते हुए विष्णु झा ने बताया कि 11 तारीख दिन सोमवार को दोपहर 3 बजे से एकादशी तिथि प्रारंभ हुई है और 12 तारीख दिन मंगलवार को दोपहर 12:45 तक रहती है. उदय व्यापनी तिथि के नियमानुसार 12 तारीख दिन मंगलवार को ही देवोत्थान एकादशी व एकादशी व्रत मान्य शास्त्र सम्मत है. साथ ही द्वादशी तिथि में इस व्रत का पारण किया जाता है.

इस बार के एकादशी के हरिवासर योग

विष्णु झा ने कहा कि इस बार देवोत्थान एकादशी के दिन हरिवासर योग लगा है. जो कि कई वर्षों के बाद देखने को मिल रहा है. 11 नवंबर से होने वाले चार दिवसीय के हरिवासर योग निहित व्रत को मिथिलांचल में सबसे कठिन और अतिदुर्लभ व्रत माना जाता है. इसमें मुख्यतः दो दिन और दो रात अर्थात 48 घंटे का निर्जला व्रत रहने का विधान है. इस व्रत के नियम एकादशी से भी ज्यादा होते हैं और व्रत के प्रारंभ और व्रत के समापन दिन एक भुक्त अरवा भोजन करना पड़ता है.

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