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Home बिहार सीवान अबतक सामान्य से 70 फीसदी कम हुई बारिश

अबतक सामान्य से 70 फीसदी कम हुई बारिश

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अबतक सामान्य से 70 फीसदी कम हुई बारिश
सांकेतिक तस्वीर

प्रतिनिधि, सीवान. पर्याप्त बारिश नहीं होने से हालात यह है कि किसानों की परेशानी बढ़तेे जा रही है. कृषि विभाग के मुताबिक जुलाई में 321.90 एमएम सामान्य रूप से बारिश होनी है. जबकि 22 दिनों में मात्र 65.71 एमएम यानी 30 फीसदी ही बारिश हुई है. कृषि विशेषज्ञों की माने तो जुलाई में भी कम बारिश होने से इसका सीधा असर धान की रोपनी पर पड़ेगा. जू न में जहां बारिश नहीं होने से बिचड़े झुलस रहे थे, वहीं अब बारिश नहीं होने से धान की फसल सूख रहे है. नहर में पानी आया है किसानों की दिन व रात वर्षा की इंतजार में कट रही है. मॉनसून छलावा बना है. बादल आते और चले जा रहे हैं, लेकिन बरस नहीं रहे हैं. तीखी धूप से खेतों से नमी कम हो रही है. इसे देख किसानों के चेहरे से मुस्कान गायब हो रही है. हाल के दिनों में निकल रही तेज धूप ने किसानों की चिता बढ़ा दी है. बिन बरसे मानसून किसानों के अरमानों पर पानी फेरने पर आमादा है. वर्षा नहीं होने से धान की रोपनी में परेशानी बढ़ गई है. किसान पंपसेट चलाकर धान की रोपनी करने में जुटे हैं. वैकल्पिक फसलों की खेती करें किसान कृषि विभाग के कर्मियों का कहना है कि मॉनसून की अनिश्चितता को देखते हुए किसानों को खरीफ के वैकल्पिक फसलों की खेती करनी चाहिए. जिससे उन्हें कम लागत में अच्छी पैदावार प्राप्त हो. कारण कि धान की नर्सरी लगाने के 35 दिनों के अंदर की बुआई कर देनी चाहिए. 35 दिन से पुरानी नर्सरी के बिचड़े से रोपाई करने से कल्ले कम निकलते हैं. इससे प्रति इकाई क्षेत्र में पौधों की संख्या घट जाती है और इससे उपज में भारी कमी आती है. इस स्थिति को देखते हुए बेहतर होगा कि किसान बारिश के सक्रिय होने का इंतजार करें. किसानों को यह भी ध्यान रखना होगा कि वो किसी भी परिस्थिति में 35 दिन से ज्यादा पुराने बिचड़े से धान की रोपाई न करें. अगर बिचड़े 35 दिन से अधिक पुराने हैं तो बेहतर होगा कि वो धान की सीधी बीजाई कर दें. बारिश नहीं होने की परिस्थिति में किसान दलहनी फसलों को भी लगा सकते हैं. अरहर, उड़द और मूंग की खेती में भी काफी अच्छा मुनाफा है. लेकिन इन फसलों को उसी जगह लगाने की सलाह दी जाती है, जहां जल निकास बहुत ही अच्छा हो. इसके अलावा मक्का एवं तिल की भी खेती की जा सकती है. आजकल किसानों को मोटे अनाज से भी अच्छा फायदा हो रहा है तो मॉनसून की वर्तमान दशा को देखते हुए मोटे अनाज के विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है. तकनीकी सहायता की आवश्यकता कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इसी तरह मॉनसून की चाल धीमी रही, तो रोपनी के कार्य में देरी होगी. जिससे धान की उत्पादकता पर भी असर पड़ेगा. विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे वैकल्पिक सिंचाई के साधनों जैसे डीजल पंप या ड्रीप इरिगेशन का उपयोग करें. . लक्ष्य प्राप्ति की उम्मीद जिला में अभी तक लक्ष्य के विरुद्ध तकरीबन 40 फीसदी धान की रोपनी हुई है. जिला में 100241 हेक्टेयर में धान की खेती करने का लक्ष्य है. कृषि विभाग को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यदि मॉनसून सामान्य रहा, तो लक्ष्य को पूरा किया जा सकेगा. डीएओ डॉ. आलोक कुमार का कहना है कि जुलाई माह बारिश व रोपनी के लिए अति महत्वपूर्ण है. जिले में धान की खेती एक प्रमुख कृषि गतिविधि है. जिससे लाखों किसानों की आजीविका जुड़ी हुई है. वर्तमान में मौसम की अनिश्चितता के बावजूद किसान प्रयासरत है.साथ ही कृषि विभाग भी लगातार सहयोग कर रहा है.

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