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अस्तित्व के संकट से जूझ रही है दाहा नदी

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अस्तित्व के संकट से जूझ रही है दाहा नदी
सांकेतिक तस्वीर

जितेंद्र उपाध्याय ,सीवान. दाहा नदी के प्रद़ूषित होने से भले ही आज यह नाले का शक्ल ले चुकी है,पर नदियों के साथ मानव सभ्यता के विकास के जुड़े इतिहास पर गौर करें तो दाहा नदी का अतीत भी सुनहरा रहा है.मुगल काल में जल मार्ग ही परिवहन के रहे बड़े साधन ने शहरों व कस्बों का नदियों के तट पर तेजी से विस्तार का अवसर दिया.इसी क्रम में जिले में दाहा नदी की अविरल धारा का परिणाम रहा कि हसनपुरा प्रखंड मुख्यालय पर मौजूद उसरी बाजार को भी एक नयी पहचान मिली. इतिहास के पन्नों में उसरी बाजार का अस्तित्व औरंगजेब के जमाने से ही माना जाता है. यह अध्यात्म के लिहाज से भी यह भूमि लोगों के लिये रमणीय रहा. पहले उसरी विशुनपुरा के नाम से जाने जानेवाले इस स्थल पर देवी देवताओं की कई मंदिर हुआ करती थी.अंग्रेजी हुकूमत में भी यहां पूल व बाजार मौजूद होने का इतिहास में उल्लेख है.यह पुल ही सड़क मार्ग से आगे का सफर तय करने का एकमात्र माध्यम था.समय अंतराल में बाजार के विकास पर गौर करें तो उसरी बुजुर्ग, उसरी खुर्द,शेखपुरा, गायघाट समेत दर्जनभर गांवों के लोग इसी पुल मार्ग के रास्ते यहां बाजार करने आते थे.बसावट और जनसंख्या विस्तार दाहा नदी के पास जल, उपजाऊ मिट्टी और परिवहन सुविधा के कारण तेजी से हुआ.बताया जाता है कि यहां पहले खेतिहर परिवार बसने लगे. इसके बाद धीरे धीरे स्थायी गांव विकसित होने लगे.बाद में यहां बाजार ने बड़े परिक्षेत्र में दुकानों का शक्ल लिया. नदी के किनारे यातायात व जनसमागम बढ़ने से किराना,कपड़ा,अनाज, पशु व्यापार,सब्जी मंडी यहां विकसित हुई.उधर आर्थिक संरचना को भी यहां नया शक्ल मिला व बाद के दिनों में बैंक, बस स्टैंड,गोदाम और मंडी जैसी सुविधायें स्थापित हुई.उधर धार्मिक,सामाजिक व सांस्कृतिक लिहाज से भी उसरी बाजार में दाहा नदी के किनारे घाट, मंदिर,मजार और धार्मिक स्थल के निर्माण हुए.यहां छठ पूजा,मुहर्रमऔर अन्य सामाजिक आयोजन हाेने लगे.जिसके बदौलत सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान मजबूत हुई.ऐसे में उसरी एक साधारण गांव एक विकसित ग्रामीण व व्यापारिक केंद्र बन गया. नदी का सुनहरा अतीत हमारी उपेक्षा से अब मलीन हो गयी दाहा नदी के अन्य हिस्से की तरह ही उसरी बाजार के तट पर भी गंदगी से पटने लगा. नदी में शिल्ट जमा होने से बाढ़,कटाव,जल प्रदूषण जैसी स्थितियां पैदा होने लगी.बाजार में जलजमाव का दंश भी लोगों को झेलना पड़ा.यह सब नदी के मलीन होने के चलते हो गया. अब यह दाहा नदी जिसने विकास के राह को अग्रसर की वह खुद विलुप्त होने के कगार पर है.जिसने शहर व गांव को बसाने का अवसर दिया.उसे हम चाहे अनचाहे में मिटाने पर तुले हैं.लिहाजा त्रेता युग में जिस नदी को बाण गंगा व बाणेश्वरी के नाम से हम पूजते रहे हैं, वही नदी अब अपने अस्तित्व को बचाने के लिये जुझ रही है.

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