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Home बिहार शिवहर शिवहर: पिपराही में ‘खेत बचाओ अभियान’, 200 से अधिक किसानों ने सीखे आधुनिक कृषि के गुर

शिवहर: पिपराही में ‘खेत बचाओ अभियान’, 200 से अधिक किसानों ने सीखे आधुनिक कृषि के गुर

शिवहर: पिपराही में ‘खेत बचाओ अभियान’, 200 से अधिक किसानों ने सीखे आधुनिक कृषि के गुर
किसानों को वैज्ञानिक खेती और पशुपालन की सीख देते कृषि वैज्ञानिक

शिवहर के पिपराही से मकसूद आलम की रिपोर्ट

Sheohar News: बिहार के शिवहर जिले के पिपराही प्रखंड अंतर्गत मसौढ़ा और नारायणपुर गांवों में ‘खेत बचाओ अभियान’ कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया. कृषि विज्ञान केंद्र शिवहर एवं आत्मा द्वारा आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में 200 से अधिक स्थानीय किसानों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया. इस अभियान का मुख्य उद्देश्य किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, टिकाऊ खेती, फसल विविधीकरण तथा वैज्ञानिक पशुपालन के प्रति जागरूक करना था.

मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए मूंग और धैचा की खेती जरूरी

कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञ डॉ. सौरभ शंकर पटेल ने किसानों से मिट्टी के स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की अपील की. उन्होंने बताया कि गेहूं की कटाई के बाद मूंग की खेती करने से खेतों में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, जिससे रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है. इसके साथ ही विशेषज्ञ हैदर अली खान और सचिन कुमार ने हरी खाद के रूप में धैचा की उपयोगिता समझाई. उन्होंने बताया कि धैचा वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर कर उसकी उर्वरा शक्ति को प्राकृतिक रूप से बढ़ाता है.

कम लागत में अधिक मुनाफे के लिए नैनो यूरिया

आधुनिक तकनीकों की जानकारी देते हुए डॉ. अमोल जाधव ने नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के वैज्ञानिक उपयोग पर प्रकाश डाला. उन्होंने कम लागत में अधिक पैदावार लेने के तरीके बताए. वहीं ग्रामीण युवाओं के स्वरोजगार के लिए डॉ. एन.एम.एच. इनलिंग ने मशरूम उत्पादन को एक बेहतरीन जरिया बताया. उन्होंने कहा कि कम जगह और कृषि अवशेषों का इस्तेमाल कर मशरूम उत्पादन से किसान अपनी आय आसानी से बढ़ा सकते हैं.

पशुपालन अपनाकर किसान कम करें खेती का जोखिम

पशुधन प्रबंधन पर बात करते हुए डॉ. पी.के. भारती ने कृषि के साथ-साथ वैज्ञानिक पशुपालन, नस्ल सुधार और डेयरी उद्यमिता को अपनाने पर जोर दिया. इसके अलावा मसौढ़ा पंचायत के सरपंच विनोद महतो ने कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही समृद्ध किसान की आधारशिला है. अंत में वैज्ञानिकों ने किसानों को धान की सीधी बुआई और कम अवधि वाली किस्में अपनाने की सलाह दी.

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