सारण संसदीय क्षेत्र में 2019 के लोस चुनाव में कुल 12 उम्मीदवारों में तीसरे स्थान पर रहा था नोटा छपरा (सदर). विगत दो दशक में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं की भावनाओं को नजरअंदाज कर येन-केन प्रकारेण लोकसभा या विधानसभा सीट पर कब्जा करने के लिए वैसे उम्मीदवार बनाया जाता है, जिन्हें हजारों मतदाता पसंद नहीं करते. ऐसी स्थिति में भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा दिये गये नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) का विकल्प भी इवीएम में दिया गया है, जिससे ऐसे मतदाता जो संबंधित उम्मीदवार में खड़े किसी भी उम्मीदवार पर विश्वास नहीं जताते हैं, वे नोटा का बटन दबा सकते हैं. इसका असर विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं पर उम्मीदवार थोपने की प्रवृति पर स्पष्ट दिख रहा है. विगत दो लोकसभा चुनावों में कुल पड़े वैध मतों के ढाई से तीन फीसदी तक मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया है, जो निश्चित तौर पर चुनाव में खड़े उम्मीदवारों को हजारों मतदाताओं द्वारा नकारने का संकेत है. 2019 के सारण लोस चुनाव में 28286, तो महाराजगंज में 22168 वोटरों ने दबाया नोटा बटन जिला निर्वाचन पदाधिकारी द्वारा चुनाव की घोषणा के बाद दी गयी सूचना पर गौर करें, तो वर्ष 2019 में सारण लोकसभा क्षेत्र में 28286 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया. जबकि, 2014 में यह संख्या 19163 थी. 2014 में इस संसदीय क्षेत्र में कुल 8 लाख 44 हजार 91 वैध मत पड़े थे. जबकि, 2019 में 9 लाख 14 हजार 734 वैध मत पड़े. ऐसी स्थिति में नोटा के बटन दबाने का अनुपात 50 फीसदी बढ़ गया. वहीं, महाराजगंज संसदीय क्षेत्र में 2014 में 23404 वोटरों ने नोटा का बटन दबाया, जबकि 2019 में 22168 वोटरों ने नोटा का बटन दबाया. 2014 में महाराजगंज में कुल 8 लाख 23250 वैध मत, तो 2019 में 9 लाख 50 हजार 535 वैध मत पड़े थे. सारण संसदीय क्षेत्र की स्थिति 2019 के लोकसभा चुनाव में यह रही कि विजयी उम्मीदवार राजीव प्रताप रूडी तथा उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी चंद्रिका राय के बाद तीसरे स्थान पर नोटा पर बटन दबाने वाले मतदाताओं का रहा. 2013 में मतदाताओं को मिला था नोटा पर बटन दबाने का अधिकार भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा पहली बार 2013 में राजस्थान, छत्तिसगढ़ आदि राज्यों के विधानसभा चुनावों में, तो 2014 के राज्यसभा चुनाव में इवीएम से होने वाले मतदान में नोटा के बटन का विकल्प दिया गया था, जिसमें यह प्रावधान है कि यदि चुनाव में खड़े सभी उम्मीदवारों से ज्यादा बटन नोटा पर दबाया जाता है, तो वैसी स्थिति में कोई भी उम्मीदवार विजयी घोषित नहीं होगा तथा पुन: चुनाव कराना होगा. इस बार भी विभिन्न राजनीतिक दलों को टिकट देने में अपने निजी स्वार्थ साधने को लेकर मतदाता नोटा का बटन दबाने की मुद्रा में दिख रहे हैं. उनका कहना है कि अधिकतर उम्मीदवार अपने निजी स्वार्थ के लिए चुनाव के दौरान तो आते हैं, परंतु जनहित से कोई लेना-देना नहीं.