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Home बिहार समस्तीपुर जिसे तुम कहते मौला उसे हम राम लिखते हैं…

जिसे तुम कहते मौला उसे हम राम लिखते हैं…

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जिसे तुम कहते मौला उसे हम राम लिखते हैं…

रोसड़ा : स्थानीय साहित्य संगम संस्थान के वार्षिकोत्सव सह सम्मान समारोह का आयोजन रविवार को मारवाड़ी विवाह भवन परिसर में आयोजित की गई.अध्यक्षता पूर्व प्रधानाचार्य प्रो शिवशंकर प्रसाद सिंह ने की. मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार एवं सुप्रसिद्ध गीतकार डॉ. नरेश कुमार विकल के द्वारा साहित्य साधना व कवि सम्मेलन के महत्व पर विस्तार से चर्चा की गयी. कार्यक्रम का उद्घाटन रमाकांत राय ने दीप प्रज्वलन कर किया. आगत अतिथियों के सम्मान में साहित्य संगम के अध्यक्ष अनिरुद्ध झा दिवाकर के द्वारा स्वागत भाषण किया गया. उद्घाटनकर्ता श्री राय ने मैथिली भाषा को आगे बढ़ाने,मैथिली में काव्य पाठ करने और मैथिली को मातृभाषा के रूप में अंगीकार करने पर बल दिया गया. कार्यक्रम को संस्था के संरक्षक कृष्ण कुमार लखोटिया एवं रमेश गामी के द्वारा भी संबोधित किया गया. इस अवसर पर आगत अतिथियों का सम्मान चादर,पाग व माला पहनाकर किया गया. कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में आगत अतिथियों व स्थानीय कवियों के द्वारा काव्य पाठ किया गया. खगड़िया से पधारे गजलकार शिव कुमार सुमन की रचना जिसे तुम कहते मौला उसे हम राम लिखते हैं… को प्रस्तुत कर सामाजिक सदभाव का भाव प्रकट किया. साहित्य अकादमी से पुरस्कृत अमित कुमार मिश्र ने वर्षा ऋतु के परिदृश्य को दर्शाते हुए अपनी मैथिली गीत बलहा वाली ये चलू धनरोपनी करय ले,शेफालिका झा की रचना मेरी मां हर बला को सर से टाल देती है, ने खूब तालियां बटोरी. पंकज कुमार पांडेय की रचना कवि बनना आसान नहीं है, के अलावे विजय व्रत कंठ,आचार्य परमानन्द प्रभाकर,कृष्ण कुमार सिंह,त्रिलोक नाथ ठाकुर,तृप्ति नारायण झा,रामस्वरूप सहनी रोसड़ाई,साधना भगत,दिनेश्वर दिनेश,लक्ष्मी महतो,मनोज कुमार झा शशि,डॉ परमानंद मिश्र,रामविलास साफी,विजय कुमार महतो,सुरेश कुमार सहनी,पत्रकार शंकर सिंह सुमन,संतोष राय,अनिरुद्ध झा दिवाकर,विश्व भूषण सिंह आदि ने भी अपने काव्य पाठों से श्रोताओं को खूब गुदगुदाया.धन्यवाद ज्ञापन तृप्ति नारायण झा के द्वारा किया गया.कार्यक्रम का संचालन रामस्वरूप सहनी रोसड़ाई एवं संजीव कुमार सिंह के द्वारा संयुक्त रूप से किया गया.

रामा रामा सावन में बरसे बदरिया…

मोहिउद्दीननगर. देश की माटी से उपजी परंपरा व पारंपरिक गीतों को हम भुलाते जा रहे हैं. कजरी मात्र एक गायन की शैली है जिसमें देशभक्ति, सामाजिक एकता, परंपरा, वीररस, श्रृंगार व विरह वेदना का अनोखा संगम है. इसे सहेज संवार कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए प्रयास की नितांत आवश्यकता है. यह बातें रविवार को अन्दौर में आयोजित कजरी गायन कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए समाजसेवी व संगीत मर्मज्ञ देवेंद्र ठाकुर ने कही. इसमें कलाकारों ने कजरी गीत गाकर सावन मास के हरियाली व सुहाना पल को अपने सुरीले कंठ से अभिव्यक्त किया. कार्यक्रम की शुरुआत संगीत शिक्षक सत्येंद्र कुमार सिंह ने रिमझिम बरसे रे बदरिया गीत गाकर किया.उभरती हुई कलाकार प्रत्याक्षी कुमारी ने रामा रामा सावन में बरसे बदरिया, प्रेमलता कुमारी ने गिरी गिरी आई सावन की बदरिया, उमाशंकर साह ने मेहंदी ला मोती झील से, अभिलाषा कुमारी ने हरे रामा भेज दो मोरी चुनरिया, तिलकधारी राय ने आया सावन बड़ा मनभावन, आयुष कुमार ने धानी हो खोल ना केवरिया गीतों के माध्यम से विलुप्त हो रहे लोकगीत को जीवंतता प्रदान की.बाल कलाकार दक्ष व दीक्षा के कजरी गायन सुन श्रोता झूमते रहे.साथ ही तालियां बजाकर कलाकारों का उत्साहवर्धन व कजरी के रसधार में डूबते-उतराते रहे. इस मौके पर बैजनाथ शर्मा, शैलेंद्र कुमार सिंह,राजेंद्र कुमार सिंह, केदारनाथ सिंह, पिंटू कुमार,संजय गोसाई,राजेश कुमार, प्रियंका कुमारी, नवनीत कुमार मौजूद थे.

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