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शौकिया ही सही अपने बच्चे को खेलने का दें मौकाः रौशन सिंह

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शौकिया ही सही अपने बच्चे को खेलने का दें मौकाः रौशन सिंह

सहरसा खेलों के प्रति समर्पित जिला एथलेटिक्स संघ सचिव सह शाररिक शिक्षक रौशन सिंह धोनी ने अभिभावकों से आग्रह किया कि स्पोर्ट्स को सिर्फ व सिर्फ मेडल एवं नौकरी से जोड़कर नहीं देखें. ये एक जीवन शैली है, यह एक अनुशासन है, यह एक प्रसाशन है, यह एक विज्ञान है, यह एक उपचार है, यह एक चिकित्सा पद्धति है, यह सर्वांगिक विकास है. यह वह अलौकिक सुख है, जिसे प्राप्त करने का अधिकार हर बच्चे को है. अपने बच्चे को इस सुख से वंचित नहीं करें. उन्होंने कहा कि जब आप अपने बच्चों को 15 साल तक शहर के सबसे नामी, सबसे प्रतिष्ठित एवं सबसे महंगे स्कूल में पढ़ाते हैं तो उस स्कूल से, समाज से, या सरकार से अपने बच्चे के लिए एक सुरक्षित भविष्य की गारंटी नहीं मांगते हैं. फिर जब आप उसे एक बेहद महंगे प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज या मैनेजमेंट कॉलेज में लाखों रूपया खर्च कर पढ़ने भेजते हैं तो उस कॉलेज से या समाज से या सरकार से अपने बच्चे के लिए एक सुरक्षित भविष्य एवं कैरियर की गारंटी मांगते हैं. आप कम से कम 16 से 18 साल तक अपने बच्चे को दिन रात, पान के पत्ते की माफिक सेते हैं एवं अपने गाढ़े पसीने और खून की कमाई खर्च कर देते हैं. फिर एक दिन आपको पता लगता है कि आपके बच्चे को तो कोई सात हजार रूपए की नौकरी भी नहीं दे रहा. भारत का एजुकेशन सिस्टम अपने स्टूडेंट्स को कैरियर एवं भविष्य की कोई गारंटी नहीं देता. इसके बावजूद उन्होंने आज तक एक भी आदमी नहीं देखा जो इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए. आखिर लोग बीटेकB एवं एमटेक करके भी तो बिल्डिंग मेटेरियल गिट्टी बालू एवं सिमेंट बेच रहे हैं. पांच वर्ष दिल्ली, मुंबई, कोटा, इंदौर में आईएएस की कड़ी तैयारी करने वाले, सेल्सक्शन नहीं होने के बाद एक दिन पेट पालते नौकरी व्यवसाय करते नज़र आते हैं. तो फिर लोग खिलाड़ियों के लिए ही क्यों सुरक्षित भविष्य की गारंटी मांगते हैं. आप कॉम्पिटेटिव स्पोर्ट्स को सिर्फ मेड़ल एवं सरकारी नौकरी से ही क्यों तौलते हैं. जिस किसी व्यक्ति ने दो चार साल कॉम्पिटेटिव स्पोर्ट्स की है. स्पोर्ट्स का नशा सारी जिंदगी जारी रहता है. उसका खुमार ता उम्र रहता है. उन्होंने कहा कि कैसा भी शौक हो कुछ दिन में सबका भूत उतर जाता है. सिर्फ व सिर्फ स्पोर्ट्स का नशा ऐसा होता है जिसकी खुमारी में आदमी सारी जिंदगी जीता है. कोई खिलाडी जिसने किसी स्पोर्ट्स में चार से पांच साल दिए हैं उस खिलाड़ी से बात करके देखें. वो बताएगा कि मैदान में खेलते खेलते, हारते जीतते उसकी जिंदगी के सबसे हसीन पल थे. उन्होंने कहा कि शौकिया ही सही ओलंपिक नहीं सही तो डिस्ट्रिक्ट या स्टेट लेबल ही सही अपने बच्चे को खेलने का मौका दें प्रोफेशनल स्पोर्ट्स के लिए रोजाना चार से आठ घंटे की ट्रेनिंग की जरूरत होती है. शौकिया स्पोर्ट्स के लिए सिर्फ एक घंटा भी काफी है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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