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Home बिहार पूर्णिया प्रेमचन्द ने साहित्य को रंगमहल से निकाल आम आदमी के बीच खड़ा किया

प्रेमचन्द ने साहित्य को रंगमहल से निकाल आम आदमी के बीच खड़ा किया

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प्रेमचन्द ने साहित्य को रंगमहल से निकाल आम आदमी के बीच खड़ा किया

जयंती की पूर्व संध्या पर प्रगतिशील लेखक संघ ने आयोजित की गोष्ठी

पूर्णिया. प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से प्रेमचन्द जयंती की पूर्व संध्या पर ‘प्रेमचन्द और किसान’ विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया. इस गोष्ठी में उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डाला गया. वक्ताओं ने कहा कि प्रेमचन्द ही वह शख्स थे जो साहित्य को राजाओं-महाराजाओं के रंगमहल से निकाल कर आम आदमी के बीच लाकर खड़ा कर दिया. पहली बार प्रेमचन्द की कहानियों में ही नायक का चरित्र बदला. अब किसी कहानी या उपन्यास का नायक राजा-महाराजा न होकर घीसू-माधव, होरी-धनिया, गोबर-झुनिया हुए. वक्ताओं ने प्रसंग के साथ खुलासा किया कि 1916 में लिखी गई कहानी पंच परमेश्वर का पात्र अलगू चौधरी और जुम्मन शेख पहले किसान पात्र थे. सूर्य नारायण सिंह यादव इन्टर महाविद्यालय,रामबाग में आयोजित इस विचार गोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. देव नारायण पासवान देव और संचालन प्रो. किशोर कुमार यादव कर रहे थे. प्रलेस की सचिव नूतन आनंद ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि कथा सम्राट प्रेमचन्द ही पहले रचनाकार थे जिसने किस्सा तोता-मैना, बैताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी और चन्द्रकान्ता संतति जैसे फैन्टेसी और अय्यारी वाली कहानियों और उपन्यासों से साहित्य को निकाल कर आम-जन के दु:ख-दर्द और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा और तो और हीरा – मोती जैसे बेजुबान जानवर बैल और झूरी इनके कथानक के पात्र बने. आज जबकि खेती में लाभकारी मूल्य के लिए किसान अपने संघर्षों के जरिए सड़क पर हैं, प्रगतिशील लेखक संघ ऐसे तमाम जनवादी आन्दोलन के साथ है और इसलिए आज ऐसे विषय पर यह कार्यक्रम आयोजित है. पूर्व वाईस चांसलर प्रो जलील अहमद ने प्रेमचन्द की रचनाओं में सामाजिक सरोकारों की तफ़सील से चर्चा की. उर्दू साहित्य के अफ़सानानिगार एहसान कासमी और स्नेहा किरण ने विषय पर पर्चा प्रस्तुत किया. डॉ. कमल किशोर चौधरी ने विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि प्रेमचन्द दातादीन, मायाशंकर जैसे बड़े किसानों के हिमायती नहीं थे. उनका किसान गोदान का होरी है,सवा सेर गेहूं का शंकर है, पूस की रात का हल्कू है. अध्यक्षीय वक्तव्य में देवनारायण पासवान देव ने किसान पर केंद्रित प्रेमचन्द की कहानियों में वर्णित कथ्यों पर विशद् विवेचना की. संस्कृतिकर्मी देव आनन्द ने धन्यवाद ज्ञापन के क्रम में कहा कि यह तो नहीं कहा जा सकता प्रेमचन्द के जमाने में जो कुछ बुरा था वो सारा खत्म हो गया है पर जो कुछ भी अच्छा था उस पर आज भारी संकट है और उसे बचाने के लिए ऐसे आयोजनों की आवश्यकता है. अन्य वक्ताओं में सुशील कुमार यादव, बैद्यनाथ झा, श्याम लाल पासवान, योगेन्द्र राम, नीरज कुमार, संजय सनातन , माधव यादव, मुकेश कुमार, अशोक कुमार सुमन और मनोज राय ने भी संबोधित किया. फोटो- 30 पूर्णिया 2- विचार गोष्ठी को संबोधित करते वक्ता

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