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Home बिहार पूर्णिया पेंशन के सवाल पर अब गोलबंद होने लगे हैं जेपी आंदोलन के भूमिगत सेनानी

पेंशन के सवाल पर अब गोलबंद होने लगे हैं जेपी आंदोलन के भूमिगत सेनानी

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पेंशन के सवाल पर अब गोलबंद होने लगे हैं जेपी आंदोलन के भूमिगत सेनानी

अलग-अलग माध्यमों से बिहार सरकार तक पहुंचायी मांग, फिर भी नहीं हो रही सुनवाई

छात्र आंदोलन के मुख्य नेताओं के जेल जाने के बाद भी कर रहे थे आंदोलन का संचालन

पूर्णिया. सरकार की ओर से देय पेंशन के सवाल पर भूमिगत रहकर जेपी आंदोलन को लगातार जारी रखने वाले आंदोलनकारी अब गोलबंद होने लगे हैं. सभी इस बात से हताश हो रहे हैं कि विभिन्न माध्यमों से सरकार तक अपनी मांग पहुंचाने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हो रही है, जबकि वे सब भी इस पेंशन के समान हकदार हैं. इनका मानना है कि वर्ष 1974 के दौरान लोकतंत्र की लड़ाई जब सड़कों से जेल की सलाखों तक पहुंची थी, तब जेपी आंदोलन के इन भूमिगत सेनानियों ने अपना सब कुछ दांव पर लगा कर आंदोलन को निरंतरता दी थी. पूर्णिया के इन भूमिगत जेपी सेनानियों ने सरकार से एक बार फिर इस मांग को गंभीरता से लेते हुए पेंशन योजना में शामिल किए जाने की मांग की है.

गौरतलब है कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर शुरू हुए छात्र आंदोलन में पूर्णिया के युवाओं ने न केवल अहम भूमिका निभायी थी बल्कि तत्कालीन तानाशाहीपर उतरे सरकारी तंत्र को नाक में दम कर दिया था. उस समय दिलीप कुमार साह ‘दीपक’, दिलीप कुमार अम्बष्ठ, रमेश कामती, सहदेव प्रसाद मंडल, मकुनी मंडल, बलराम सिंह, कमल किशोर दास, बिरेन्द्र विद्यार्थी समेत सैकड़ों युवा इस आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभा रहे थे. भूमिगत जेपी सेनानियों के अनुसार, अग्रणी भूमिका निभाने वालों में कई छात्र नेताओं की गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल भी जाना पड़ा था. इसके बावजूद आंदोलन को कभी ब्रेक नहीं लगा. उन दिनों इस आंदोलन में सक्रिय रहने वाले अभिमन्यु कुमार मन्नू बताते हैं कि प्रमुख छात्र नेताओं की गिरफ्तारी के बाद दूसरी और तीसरी कड़ी के युवाओं पर आंदोलन के संचालन की जिम्मेदारी आ गयी थी, जिसे बखूबी निभाया गया. कहते हैं कि आंदोलन से जुड़े दूसरी और तीसरी कड़ी के युवाओं ने पकड़े जाने के बाद आंदोलन के शिथिल पड़ने की आशंका के कारण भूमिगत रहकर अपनी सक्रियता बनाये रखी. इसमें एक तरफ यदि पढ़ाई का नुकसान हुआ, तो घरों की डांट-फटकार भी सहनी पड़ी. इसमें जिला मुख्यालय से प्रखंड तक के साथी शामिल थे.

संघर्ष के नायक फिर भी पेंशन व सम्मान से वंचित

भूमिगत जेपी सेनानियों का कहना है कि अगर देखा जाये तो वे सब आपातकाल के ऐतिहासिक संघर्ष के नायक हैं. इसके बावजूद अब तक पेंशन और सम्मान से वंचित हैं. मन्नू कहते हैं कि सिर्फ पेंशन की नहीं, बल्कि अपनी पहचान और कुर्बानी की कद्र की मांग की जा रही है, जिसके वे हकदार भी हैं. कई भूमिगत जेपी सेनानियों ने बताया कि 18 मार्च 1974 से 21 मार्च 1977 तक चले जेपी आंदोलन को सफल करने में इन भूमिगत सेनानियों की अग्रणी भूमिका रही है, पर जेपी सम्मान योजना के तहत इन्हें पेंशन से वंचित कर दिया गया है. भूमिगत होकर इस आंदोलन के क्रांतिकारियों का सहयोग करने वालों को भी पेंशन मिलनी चाहिए. बताया गया कि इसके लिए संबंधित जनप्रतिनिधियों एवं अन्य माध्यमों से सरकार तक मांग पहुंचायी गयी है. अलग-अलग उन्हें भरोसा भी दिलाया गया है, पर इस दिशा में सकारात्मक पहल नहीं हो रही है. इससे वे गोलबंदी को विवश हो रहे हैं.

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