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Home बिहार पूर्णिया पूर्णिया में पहली बार मंचित हुआ भव्य नाटक ‘सीता स्वयंवर’, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों का दिया संदेश

पूर्णिया में पहली बार मंचित हुआ भव्य नाटक ‘सीता स्वयंवर’, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों का दिया संदेश

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पूर्णिया में पहली बार मंचित हुआ भव्य नाटक ‘सीता स्वयंवर’, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों का दिया संदेश
कला भवन में मंचित नाटक 'सीता स्वयंवर' के दौरान भगवान राम द्वारा शिव धनुष भंग का दृश्य प्रस्तुत करते कलाकार.

पूर्णिया से विकास वर्मा की रिपोर्ट:

Sita Swayamvar Purnia: पूर्णिया के कला भवन में रविवार की शाम कला, संस्कृति और भारतीय परंपरा का भव्य संगम देखने को मिला. कोशी आलोक के बैनर तले पहली बार शहर में रामायण के प्रसिद्ध प्रसंग पर आधारित नाटक ‘सीता स्वयंवर’ का सफल मंचन किया गया. इस सांस्कृतिक आयोजन ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करने के साथ भारतीय संस्कृति, मर्यादा, कर्तव्य, नारी सम्मान और सामाजिक मूल्यों का प्रभावशाली संदेश भी दिया.
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पूर्णिया में पहली बार मंचित हुआ भव्य नाटक 'सीता स्वयंवर', संस्कृति और सामाजिक मूल्यों का दिया संदेश 3

कार्यक्रम का उद्घाटन वीवीआईटी के सचिव ब्रजेश चंद्र मिश्र, वरिष्ठ रंगकर्मी मिथिलेश राय, संजय सिंह, जयबर्धन सिंह और प्रेस क्लब अध्यक्ष नंद किशोर सिंह ने संयुक्त रूप से किया.

रामायण के प्रसंगों का हुआ जीवंत मंचन

नाटक की शुरुआत महर्षि विश्वामित्र के अयोध्या आगमन और भगवान राम-लक्ष्मण के मिथिला प्रस्थान से हुई. इसके बाद जनकपुरी का दरबार, माता सीता की मनःस्थिति, स्वयंवर की तैयारियां, विभिन्न राज्यों से आए राजाओं का आगमन और भगवान शिव के धनुष को उठाने के उनके असफल प्रयासों का प्रभावशाली मंचन किया गया.

नाटक का सबसे रोमांचक क्षण तब आया, जब भगवान राम ने शिव धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया और धनुष भंग हो गया. इस दृश्य के साथ पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट और ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से गूंज उठा.

परशुराम और लक्ष्मण के संवाद ने बांधा समां

नाटक में परशुराम और लक्ष्मण के बीच संवाद दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा. दोनों कलाकारों की दमदार संवाद अदायगी और प्रभावशाली अभिनय ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.

वहीं, मैथिली गीतों और लोकनृत्यों ने मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया. मंच सज्जा, पारंपरिक परिधान, प्रकाश व्यवस्था, संगीत और प्रॉप्स के बेहतर संयोजन ने दर्शकों को त्रेता युग के मिथिला दरबार का अनुभव कराया.

नई पीढ़ी तक भारतीय संस्कृति पहुंचाने का प्रयास

नाटक के निर्देशक सुनील सुमन और स्क्रिप्ट लेखक एवं सह-निर्देशक सुमित निहाल ने बताया कि इस प्रस्तुति की तैयारी कई सप्ताह से चल रही थी. उन्होंने कहा कि उद्देश्य केवल धार्मिक कथा का मंचन करना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के उन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है, जो आज भी समाज के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं.

कलाकारों ने निभाईं प्रभावशाली भूमिकाएं

नाटक में भगवान राम की भूमिका में अजीत सिंह बप्पा, माता सीता के रूप में कुमारी चांदनी शुक्ला, लक्ष्मण के रूप में राज श्रीवास्तव, महर्षि विश्वामित्र के रूप में रोहितस्व पप्पू, राजा जनक के रूप में अमित कुंवर, रानी सुनयना के रूप में सोनाली चक्रवर्ती, रावण के रूप में अभिनव आनंद और परशुराम की भूमिका में बादल झा ने प्रभावशाली अभिनय कर दर्शकों की खूब सराहना बटोरी.

नृत्य और तकनीकी टीम ने बढ़ाई प्रस्तुति की भव्यता

राजाओं की भूमिका में चंदन कुमार, संजय कुमार, जागेश्वर, नीतीश कुमार, रिशित दास और अनमोल ने भी अपनी भूमिकाओं को जीवंत बनाया. मंत्री की भूमिका में अखिलेश कुमार भारती तथा दरबारी और कहार के रूप में रौनक ने भी प्रभावशाली प्रस्तुति दी.

सीता की सखियों के रूप में निधि सिंह, तन्वी सिंह और काजल कुमारी ने अपनी प्रस्तुति से नाटक को जीवंत बनाया. वहीं अंकिता सिंह, खुशी कुमारी, भूमि नंदी, मेघा स्वर्णकार, प्रीति कुमारी, मेघा कुमारी, स्मिति और रुचि शर्मा के नृत्य प्रदर्शन ने दर्शकों का मन मोह लिया.

कॉस्ट्यूम डिजाइनर एवं लुक स्टाइलिस्ट सर्व प्रियदर्शी, मेकअप आर्टिस्ट आशीष कुमार, ड्रेसमैन रोहित रापचिक और रंजन कुमार, प्रॉप्स प्रभारी सागर कुमार दास तथा सेट डिजाइनर सुमित निहाल की मेहनत मंच पर स्पष्ट दिखाई दी. संगीत संयोजन स्वयं निर्देशक सुनील सुमन ने किया.

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