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काझाकोठी पीर बाबा की मजार पर उर्स आज

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काझाकोठी पीर बाबा की मजार पर उर्स आज
हजरत ख्वाजा सिराजुद्दीन औलिया की मजार,काझा कोठी, पूर्णिया
पूर्णिया के केनगर से मो. शहजादा हसन की रिपोर्ट

Hazrat Khwaja Sirajuddin Aulia: बिहार का सीमांचल क्षेत्र हमेशा से सूफी संतों की भूमि और आपसी भाईचारे का गवाह रहा है. इसी कड़ी में पूर्णिया जिले के केनगर प्रखंड अंतर्गत ऐतिहासिक पर्यटन स्थल काझा कोठी स्थित हजरत ख्वाजा सिराजुद्दीन औलिया की मजार पर शनिवार को आस्था, अकीदत और सांप्रदायिक सौहार्द का महासैलाब उमड़ने जा रहा है. इस पवित्र मजार पर सदियों पुरानी एक ऐसी अनोखी और ऐतिहासिक परंपरा जीवंत है, जिसे आज भी एक हिंदू परिवार पूरी शिद्दत और निष्ठा के साथ निभा रहा है. स्थापित मान्यताओं के अनुसार, उर्स के मुबारक मौके पर मजार शरीफ पर पहली आधिकारिक चादरपोशी काझा पंचायत के प्रतिष्ठित दिवंगत विशेष बाबू के पुत्र त्रिपुरारी शर्मा (54 वर्ष) द्वारा की जाती है. उनके द्वारा गुले-पोशी और सजदा किए जाने के बाद ही मजार के कपाट देश-विदेश से आए आम जायरीनों के लिए खोले जाते हैं.

स्वप्न में आए पीर बाबा; घने जंगलों को चीरकर विशेष बाबू ने ढूंढी थी मजार

  • सपनों में आए बाबा: इस मजार का इतिहास किसी ईश्वरीय चमत्कार से कम नहीं है. स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि दशकों पहले यह पूरा इलाका घने जंगलों और कंटीली झाड़ियों से घिरा हुआ था. तब पीर बाबा ने दिवंगत विशेष बाबू के स्वप्न में आकर इस वीराने में दफन अपनी मजार की देखरेख और सेवा करने का आध्यात्मिक आदेश दिया था.
  • जान की बाजी लगाई: बाबा के आदेश को शिरोधार्य कर विशेष बाबू ने हिंसक जानवरों की परवाह न करते हुए घने जंगलों को काटा और झाड़ियों के बीच से इस पवित्र मजार स्थल को खोज निकाला.
  • सेवा से मिली संतान: जनश्रुति है कि शादी के कई साल बीत जाने के बाद भी विशेष बाबू को कोई संतान नहीं थी और वे काफी निराश रहते थे. लेकिन मजार की नि:स्वार्थ सफाई और सेवा शुरू करते ही पीर बाबा का ऐसा करम हुआ कि उनके घर किलकारियां गूंजीं और त्रिपुरारी शर्मा का जन्म हुआ.

“विपत्ति आते ही नंगे पैर दौड़ा आता हूं; बाबा ने कभी खाली हाथ नहीं लौटाया”

पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही आस्था: अपने पिता की इस महान विरासत और अटूट आस्था को पूरी कड़ाई से संभाल रहे त्रिपुरारी शर्मा ने भावुक होते हुए बाबा के रहमो-करम की गवाही दी. उन्होंने बताया, “पिताजी के जाने के बाद मैं इस कौमी एकता की परंपरा को अपनी आखिरी सांस तक निभाऊंगा. जब भी मुझ पर या मेरे परिवार पर कोई विपत्ति आती है, मैं नंगे पैर बाबा की चौखट पर हाजिरी लगाने आ जाता हूं. बाबा ने मुझे आज तक कभी खाली हाथ नहीं लौटाया.”

उन्होंने एक ऐतिहासिक वाकये का जिक्र करते हुए बताया कि एक बार चादरपोशी के ठीक समय आसमान में काले बादल छा गए और मूसलाधार बारिश का खतरा मंडराने लगा. हजारों दूर-दराज से आए भक्तों की परेशानी देख उन्होंने मजार के सामने रो-रोकर प्रार्थना की. पलक झपकते ही चमत्कार हुआ, आसमान साफ हो गया और कड़कती धूप निकल आई.

सरहद पार नेपाल और बंगाल से आते हैं हजारों मुरीद; सुरक्षा के कड़े इंतजाम

काझा कोठी की यह मजार आज के आधुनिक दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे बड़ा और जीवंत प्रतीक बनकर उभरी है. यहाँ केवल पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज जैसे सीमांचल के जिलों से ही लोग नहीं आते, बल्कि पड़ोसी देश नेपाल के विभिन्न शहरों और पश्चिम बंगाल के मालदा, दिनाजपुर से भी हजारों की तादाद में अकीदतमंद मन्नतें मांगने और चादर चढ़ाने यहाँ पहुंचते हैं.

प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा के उपाय:

उर्स के दौरान उमड़ने वाली भारी भीड़ को देखते हुए पूर्णिया जिला प्रशासन और स्थानीय केनगर थाना पुलिस पूरी तरह मुस्तैद है. मेला परिसर और मजार के आस-पास विधि-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त संख्या में मजिस्ट्रेट और भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है. महिला और पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग कतारों और बैरिकेडिंग की पुख्ता व्यवस्था की गई है, ताकि जायरीनों को जियारत करने में किसी भी प्रकार की कठिनाई न हो. मजार कमेटी द्वारा शुद्ध पेयजल और प्राथमिक चिकित्सा शिविर की भी व्यवस्था की गई है.

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