पूर्णिया में 100 साल से श्रद्धा का केंद्र है जलेश्वरनाथ महादेव मंदिर, सावन में उमड़ती है भक्तों की भीड़

Aaj Ka Darshan: पूर्णिया के जलालगढ़ स्थित जलेश्वरनाथ महादेव मंदिर का इतिहास, सावन में रुद्राभिषेक का महत्व, सोमवारी की तिथि और धार्मिक मान्यता जानें.

By Pratyush Prashant | July 6, 2026 9:46 AM

पूर्णिया के जलालगढ़ से निकेश राय की रिपोर्ट

Aaj Ka Darshan: सावन का महीना आते ही भगवान शिव के मंदिरों में भक्तों की आस्था अपने चरम पर पहुंच जाती है. पूर्णिया जिले के जलालगढ़ स्थित जलेश्वरनाथ महादेव मंदिर भी ऐसा ही एक पावन धाम है, जहां हर दिन शिवभक्तों का तांता लगा रहता है. खासकर सावन में यहां होने वाला रुद्राभिषेक और संध्या आरती श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती है.

जलालगढ़ के नेताजी चौक स्थित काली मंदिर परिसर में बना यह शिव मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि स्थानीय लोगों की वर्षों पुरानी श्रद्धा और परंपरा का भी प्रतीक माना जाता है. यही कारण है कि सावन के दौरान यहां सुबह से लेकर देर शाम तक पूजा-अर्चना के लिए भक्तों की भीड़ लगी रहती है.

एक शताब्दी पुरानी आस्था से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

जलेश्वरनाथ महादेव मंदिर का इतिहास करीब एक शताब्दी पुराना बताया जाता है. स्थानीय लोगों के अनुसार सबसे पहले इस परिसर में मां काली का मंदिर स्थापित हुआ था. उसी समय से मंदिर परिसर में स्थित शिवलिंग की भी नियमित पूजा होती रही.

पिछले लगभग पांच वर्षों में यहां भव्य महादेव मंदिर का निर्माण हुआ, जिसके बाद श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ी है. अब यह मंदिर जलालगढ़ और आसपास के क्षेत्रों के प्रमुख शिवालयों में गिना जाता है.

सावन में रुद्राभिषेक और भव्य आरती बनती है आकर्षण का केंद्र

सावन महीने में मंदिर का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है. प्रतिदिन भगवान शिव का रुद्राभिषेक किया जाता है और शाम को विशेष श्रृंगार के साथ भव्य आरती होती है. इस दौरान पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव के जयघोष और भक्ति के माहौल से गूंज उठता है.

रुद्राभिषेक के लिए प्रत्येक वर्ष पूर्णिया के आचार्य पंडित जय प्रकाश शर्मा यहां पहुंचते हैं. उनका कहना है कि भगवान शिव की पूजा पूरे वर्ष फलदायी होती है, लेकिन सावन माह में शिव आराधना का विशेष महत्व बताया गया है. इस दौरान श्रद्धापूर्वक पूजा करने से भक्तों के जीवन के कष्ट दूर होने और मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है.

संध्या आरती में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

रुद्राभिषेक के बाद शाम की आरती मंदिर का सबसे आकर्षक आयोजन होती है. महादेव के विशेष श्रृंगार और दीपों की रोशनी के बीच बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

स्थानीय लोगों का कहना है कि सावन के दौरान पूरे क्षेत्र का वातावरण भक्तिमय हो जाता है. मंदिर परिसर में शिव स्तुति, भजन और आरती के बीच श्रद्धालु आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं.

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Aaj Ka Darshan: इस बार कब हैं सावन की सोमवारी?

इस वर्ष सावन माह 30 जुलाई से 28 अगस्त तक रहेगा. पहली सोमवारी 3 अगस्त, दूसरी 10 अगस्त, तीसरी 17 अगस्त और चौथी तथा अंतिम सोमवारी 24 अगस्त को पड़ेगी.

मान्यता है कि इन चारों सोमवार को भगवान शिव का रुद्राभिषेक और जलाभिषेक विशेष फलदायी होता है. हालांकि श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भगवान भोलेनाथ की पूजा किसी भी दिन पूरे मन से की जाए तो उनकी कृपा अवश्य प्राप्त होती है.

रुद्राभिषेक का धार्मिक महत्व क्या है?

पूर्णिया के ज्योतिषाचार्य तिवारी बाबा बताते हैं कि ‘रुद्राभिषेक’ शब्द ‘रुद्र’ और ‘अभिषेक’ से मिलकर बना है. रुद्र भगवान शिव का एक स्वरूप है, जबकि अभिषेक का अर्थ स्नान कराना होता है.

उनके अनुसार सावन में रुद्राभिषेक कराने से घर में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है. धार्मिक मान्यता यह भी है कि इससे ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है. यही वजह है कि सावन के पूरे महीने जलेश्वरनाथ महादेव मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है.

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