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Home बिहार पटना लिट्टी चोखा, दही-चूड़ा, सत्तू, खाजा व पुरुकिया को मिलेगी राष्ट्रीय पहचान

लिट्टी चोखा, दही-चूड़ा, सत्तू, खाजा व पुरुकिया को मिलेगी राष्ट्रीय पहचान

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लिट्टी चोखा, दही-चूड़ा, सत्तू, खाजा व पुरुकिया को मिलेगी राष्ट्रीय पहचान

– व्यंजनों समेत राज्यभर के 48 उत्पादों को जीआइ टैग दिलाने की कवायद शुरू मनोज कुमार, पटना बिहार के लिट्टी चोखा, दही-चूड़ा और सत्तू को राष्ट्रीय पहचान मिलेगी. इसके साथ ही पिपरा का खाजा, पटना का रामदाना लाई व गोपालगंज के पुरुकिया समेत 48 फसलों व व्यंजनों को राष्ट्रीय पहचान प्राप्त होगा. वहीं, मोकामा का मखाना व मशरूम, रोहतास का सोनाचूर चावल, बांका-मुंगेर का पाटम अरहर, भागलपुर का तितुआ मसूर भी राष्ट्रीय पहचान पायेंगे. पटना के दीघा का मालदा आम, समस्तीपुर का बथुआ आम, सहरसा का नटकी धान, रोहतास का गुलशन टमाटर को भी राष्ट्रीय पहचान प्राप्त होगी. इन उत्पादों के साथ-साथ सिंदूर के पौधे को भी जीआइ टैग के लिए प्रस्तावित किया गया है. बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने इसे लेकर मंत्रणा की है. इसमें इन फसलों व व्यंजनों को जीआइ टैग दिलाने के प्रस्ताव आये हैं. इन उत्पादों का पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन ले लिया गया है. इनका इतिहास, गुणवत्ता और महत्व को रेखांकित कर लिया गया है. इन उत्पादों को राष्ट्रीय पहचान मिलने के बाद इनकी डिमांड बढ़ेगी. इससे किसानों की आय में इजाफा होगा. जिलों में भ्रमण कर ही वैज्ञानिकों की टीम जीआइ टैग दिलाने को लेकर जिलों में विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम भ्रमण कर रही है. लंबे समय से किसानो की ओर से की जाने वाली खेती और इनकी गुणवत्ता परखी जा रही है. व्यंजनों व उत्पादों के बारे में जानकारी ली जा रही है. बीते छह माह से विश्वविद्यालय की ओर से यह सिलसिला चल रहा है. इसके लिए एक स्पेशल सेल भी बनायी गयी है. जीआइ टैग में बिहार बनेगा अव्वल: कुलपति बीएयू के कुलपति डॉ डीआर सिंह ने कहा कि बिहार के उत्पादों को जीआइ टैग दिलाने को लेकर बिहार सरकार गंभीर है. पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में बिहार से अधिक जीआइ टैग उत्पाद हैं. बिहार को इस मामले में अव्वल लाने की कवायद हो रही है. जिलों में भ्रमण कर जाना जा रहा उत्पादों का इतिहास: निदेशक विश्वविद्यालय के शोध निदेशक डॉ अनिल कुमार सिंह ने बताया कि बिहार के उत्पादों को जीआइ टैग दिलाने को लेकर वैज्ञानिकों की टीम लगी है. इसके लिए स्पेशल सेल भी बनायी गयी है. हर जिले में जाकर व्यंजनों व फसलों के वैदिक व पुरातन इतिहास के साथ उनके महत्व और गुणवत्ता की जानकारी ली जा रही है. नाबार्ड भी इसमें सहयोग कर रहा है.

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