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Home बिहार मुंगेर वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी के प्रवासी साहित्य का भी विस्तार : प्रो. शिवकुमार

वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी के प्रवासी साहित्य का भी विस्तार : प्रो. शिवकुमार

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वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी के प्रवासी साहित्य का भी विस्तार : प्रो. शिवकुमार

मुंगेर हिन्दी भाषा न केवल देश के अधिकांश जनता की भाषा है़ बल्कि विश्व के अधिकांश देशों में बोली और समझी जानेवाली भाषा है. बदलते परिदृश्य में हिन्दी संसार की तीसरी सबसे अधिक बोली जानेवाली भाषा है. इसका साहित्य काफी समृद्ध है. इस भाषा में नित नये शोध हो रहे हैं. वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी में प्रवासी साहित्य का भी विस्तार हुआ है. उक्त बातें विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर जेआरएस कॉलेज में हिंदी पीजी विभाग में आयोजित परिचर्चा कार्यक्रम के दौरान विभागाध्यक्ष प्रो. शिव कुमार मंडल ने की. परिचर्चा का विषय ”हिन्दी शोध की संभावनाएं एवं चुनौतियां” था. उन्होंने कहा कि आज 10 जनवरी है. इस तिथि को हम विश्व हिन्दी दिवस के रुप मनाते हैं. साहित्य के विविध विधाओं पर शोध कार्य हिंदी में तो हो ही रहे हैं और कई क्षेत्र ऐसे हैं, जिसमें शोध की असीम संभावनाएं हैं. भाषाविज्ञान, हिन्दी भाषा, लोक साहित्य, क्षेत्रीय बोलियां आदि ऐसे विषय है. जिसमें शोध किए जा सकते हैं. मुंगेर विश्वविद्यालय में पहली बार शोध की शुरुआत हुई है. हलांकि अल्प संसाधन के बाबजूद शोधार्थियों के पीएचडी कोर्स वर्क सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए. पीजी हिन्दी विभाग लगातार शैक्षणिक व शोध की दिशा में अग्रसर है. डा.सुनील कुमार ने परिचर्चा का बीज वक्तव्य देते हुए शोध की संभावनाएं एवं चुनौतियां की ओर संकेत किया. डॉ बृजेंद्र कुमार ब्रजेश ने भक्तिकालीन साहित्य पर शोध की संभावनाओं पर प्रकाश डाला. डॉ अभय कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा शोध कार्य की शुरुआत हो रही है. अब जरूरत यह है कि हम और हमारे शोधार्थी अनुसंधान को अंतर्विषयक बनाये. जिसमें अपने विषय को इतिहास, दर्शन,अर्थशास्त्र , मनोविज्ञान आदि से जोड़ कर शोध करने की आवश्यकता है. डॉ चन्दन कुमार ने कहा कि शोधार्थी अपने विषयगत रुचि के आधार पर खोजपरक दृष्टि को स्पष्ट करें और उसे प्राथमिकता दें. इस दौरान डॉ अजय प्रकाश, डॉ राजीव कुमार, डॉ रोशन रवि आदि ने भी अपने विचार रखे.

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