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Home बिहार मुंगेर अपने भीतर में अहंकार से लिप्त मैं को समाप्त करें : स्वामी निरंजनानंद

अपने भीतर में अहंकार से लिप्त मैं को समाप्त करें : स्वामी निरंजनानंद

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अपने भीतर में अहंकार से लिप्त मैं को समाप्त करें : स्वामी निरंजनानंद

– श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ में दक्षिण भारत के श्रीरंगनाथ स्वामी मंदिर के मुख्य पुजारी अररेयर कृष्ण ने लिया भाग मुंगेर पादुका दर्शन संन्यासपीठ के वार्षिकोत्सव पर सोमवार को श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ की शुरूआत हुई. जिसमें दक्षिण भारत के श्रीरंगम में स्थित प्रसिद्ध वैष्णव मंदिर श्रीरंगनाथ स्वामी मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य अररेयर कृष्ण, योग विद्यालय के परमाचार्य स्वामी निरंजनानंद मुख्य रूप से मौजूद थे. वाराणसी से आये आचार्यों ने अरणि मंथन कर यज्ञ की भूमि को ऊर्जान्वित किया और श्री सूक्त, पुरुष सूक्त और नारायण सूक्त के साथ श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ का श्रीगणेश किया. आचार्य अरेयर कृष्ण ने बताया कि इस पावन यज्ञ में भाग लेने कि प्रेरणा उन्हें भीरत से हुई. उन्होंने बताया कि 1400 वर्षों से उनके पूर्वजों ने इस मंदिर में भगवान नारायण की सेवा व आराधना की है और वे इस सौभाग्य को प्राप्त करने वाली 24 वीं पीढी है. स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि हमारे परमगुरु स्वामी शिवानंद का जन्मदिन है. जब-जब इस धरती पर संतो व महात्माओं का अवतरण हुआ है, उन्होंने संपूर्ण मानव जाति के लिए यही उद्देश्य दिया कि सभी को अपने भीतर आध्यात्मिक चेतना का विकास करना चाहिए. उन्होंने कहा कि स्वामी शिवानंद सभी को यही शिक्षा देते हैं कि दिव्य जीवन जीने का हमेशा प्रयास करो और यह प्रयास तभी संभव होगा जब हम अपने भीतर में अहंकार से लिप्त ”””” मैं ”””” को समाप्त करेंगे. उन्होंने कहा कि स्वामी शिवानंद का एक ही फार्मुला है अच्छा बनो-अच्छा करो. ऐसे करने के लिए हमें अपनी मनोवृतियों का सामना करना होगा. फुल रूपी इस जीवन में जो कांटे है उनके प्रति सजग रहकर हमें फुल के सौंदर्य को पहचानना होगा. स्वामी सत्यानंद ने स्वामी शिवानंद के संदेश को स्वयं जीकर विश्व को दो विशेष चीजें प्रदान कि योग और यज्ञ. योग जीवन जीने का एक दृढ़ माध्यम है और यज्ञ मन की बंधकारी प्रवृर्तियों को परिवर्तित करने का एक सरल उपाय है. स्वामी सत्यानंद ने योग द्वारा अच्छा बनने व यज्ञ द्वारा अच्छा करने कि सजगता को उत्पन्न किया. उन्होंने हमें यह सिखलाया कि यदि हम योग का व्यवहारिक रूप से अभ्यास करेंगे और यज्ञ के द्वारा अपने मन, विचारों व हृदय का पोषण करेंगे तो जीवन में केवल सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होगा.

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