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अतीत को जानना जरूरी है, अतीत को जाने बगैर नहीं रखा जा सकता भविष्य का नींव

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अतीत को जानना जरूरी है, अतीत को जाने बगैर नहीं रखा जा सकता भविष्य का नींव

नोट – इस खबर में 16 नंबर तसवीर लगायें – प्रतिनिधि , मधेपुरा ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय के संस्थापक महामना कीर्ति नारायण मंडल की पुण्यतिथि पर शनिवार को कोसी की सांस्कृतिक विरासत विषयक राष्ट्रीय सेमिनार (कीर्ति कुम्भ) का आयोजन किया गया, जिसका शुभारंभ समाजवादी व साहित्यकार प्रो भूपेंद्र नारायण यादव मधेपुरी ने किया. उन्होंने कहा कि अतीत को जानना जरूरी है. अतीत को जाने बगैर भविष्य का नींव नहीं रखा जा सकता है. उन्होंने कहा कि कोसी में शिक्षा के प्रचार-प्रसार में कीर्ति नारायण मंडल का योगदान सर्वोपरि है. उनकी त्याग-तपस्या व कर्मनिष्ठा से हमें प्रेरणा मिलती है. उनकी यश, कीर्ति व ख्याति आज भी कायम है और हमेशा कायम रहेगी. उन्होंने कहा कहा कि कीर्ति बाबू ने समाज में शिक्षा की रौशनी फैलाने के लिए महात्मा बुद्ध की तरह अपना गृहत्याग कर दिया. वे ज्ञान की खोज में वे बनारस व प्रयागराज आदि धर्म स्थल भी गये. अंततः उन्हें यह ज्ञान हुआ कि दुखी-पीड़ित लोगों की सेवा की. वे श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तरह चुनकर विद्वानों को अपने संस्थान में लाते थे. कर्ण की तरह दानी थे कीर्ति बाबू मुख्य वक्ता मानविकी संकाय के पूर्व अध्यक्ष प्रो विनय कुमार चौधरी ने कहा कि कीर्ति बाबू कर्ण की तरह महादानी थे. उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति संपत्ति का कण-कण समाज को दान कर दिया और अपने लिए कुछ भी बचाकर नहीं रखा. उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शिक्षा-जागरण के लिए समर्पित कर दिया. प्रधानाचार्य प्रो कैलाश प्रसाद यादव ने कहा कि कीर्ति नारायण मंडल ने अपने पिता व माता दोनों के नाम पर महाविद्यालय की स्थापना की. पिता के नाम पर ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय व अपनी माता के नाम पर पार्वती विज्ञान महाविद्यालय की स्थापना की. आगे यही दोनों महाविद्यालय मधेपुरा में विश्वविद्यालय के निर्माण का आधार बना. उन्होंने कहा कि यह कीर्ति-कुंभ कीर्ति बाबू के साथ साथ कोसी की संपूर्ण सांस्कृतिक विरासत को जानने-समझने का एक प्रयास है. पूर्व प्रधानाचार्य प्रो केपी यादव ने कहा कि कीर्ति बाबू के जीवन में तप की आग व तपस्या की ज्वाला थी. छात्र कल्याण पदाधिकारी प्रो अशोक कुमार ने कहा कि किसी एक शिक्षण संस्थान की परिकल्पना अपने आप में दुरूह कार्य है, लेकिन कीर्ति बाबू ने दर्जन भर संस्थानों की स्थापना किया जो आज इस क्षेत्र की प्रतिभाओं को उड़ान दे रहा है. प्रो नरेश कुमार ने कहा कि बाबा के नाम से चर्चित कीर्ति नारायण मंडल आखिरी दिनों में उनके वहां ही रहा करते थे उनके सानिध्य में गुजरे पल अनमोल हैं. मौके पर अर्थपाल डॉ रत्नदीप ने स्वागत-भाषण दिया. संयोजक डॉ सुधांशु शेखर ने विषय प्रवेश कराया. उन्होंने कहा कि कोसी की संस्कृति में सभी मनुष्यों तथा मनुष्येतर प्राणियों के प्रति कृतज्ञता का भाव है. कीर्ति-कुंभ भी वास्तव में ज्ञान-यज्ञ के साथ-साथ अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का अनुष्ठान है. मौके पर परीक्षा नियंत्रक डॉ शंकर कुमार मिश्र व पूर्व अर्थपाल डॉ मिथिलेश कुमार अरिमर्दन ने भी विचार व्यक्त किया. कार्यक्रम का संचालन डॉ हर्षवर्धन सिंह राठौड़ ने किया. उन्होंने बताया कि द्वितीय सत्र में ऑफलाइन पेपर प्रजेंटेशन हुआ. इसकी अध्यक्षता प्रो सिद्धेश्वर काश्यप ने की. इसमें विभिन्न प्रांतों, विश्वविद्यालयों, कॉलेजों से आये एक दर्जन शिक्षकों व शोधार्थियों ने आलेख और शोध सार का वाचन किया. समापन के पूर्व कार्यक्रम संयोजक डॉ सुधांशु शेखर ने आयोजन में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी लोगों के प्रति आभार प्रकट किया.

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