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ज्ञान का पतन होने पर क्षीण हो जाती है मानवता – गुरुवानंद महाराज

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ज्ञान का पतन होने पर क्षीण हो जाती है मानवता – गुरुवानंद महाराज

फोटो – मधेपुरा- 05 प्रवचन के दौरान संत

सदगुरु संत काग बाबा की 90वां जयंती सत्संग समारोह आयोजित

प्रतिनिधि, मधेपुरा

सदर प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत साहुगढ़ पंचायत के दुल्हाराम टोला में बुधवार को सदगुरु संत काग बाबा की जयंती पर सत्संग समारोह का आयोजन किया गया. इस दौरान आचार्य गुरुवानंद महाराज ने उनकी जीवनी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब ज्ञान का पतन होता है जब मानवता क्षीण न हो जाती है. व्यक्तिगत सुख से मनुष्य लिप्त हो जाता है. अपनापन न्यून हो जाता है. राष्ट्रीयता नगण्य हो जाती है. शिष्टाचार व सदाचार लेस मात्र रह जाती है. ऐसी पुकार दिग्वत मुक्त पुरुष को द्रवित कर देती है. रक्षार्थ के लिए उन्हें धरा पर आने की आकांक्षा तीव्र हो जाती है. उन्हें संसार में आने का प्रभु अवसर देते हैं. वे संसार का भार लेकर संसार का कल्याण करते हैं. इस विकट स्थिति में एक जनवरी 1936 को सदगुरुदेव संत काग बाबा का सहरसा जिला अंतर्गत गोलमा ग्राम में अवतरित हुए. उनका कर्म क्षेत्र ननिहाल मधेपुरा जिला अंतर्गत साहुगढ (जानकी टोला) रहा है. यहां से मैट्रिक की योग्यता प्राप्त किया. उन्होंने मधेपुरा में सहायक निबंधक कार्यालय में लिपिक के पदभार संभालते हुए पारिवारिक जीवन के निर्वाह के अवधि में उसी कार्यालय से प्रधान लिपिक के पद से 1995 में सेवानिवृत्त हुये. संत काग बाबा ने पारिवारिक आश्रम को संन्यास आश्रम में बदलकर योग साधना से योग की पराकाष्ठा को प्राप्त किया. जिसका प्रत्येक्ष प्रभाव उनके जीवन काल की अनेकों घटनाओं में से एक घटना तीन कौवे वाली है. जो 27.09.1979 से जून 1983 तक उनके गोद में बैठे कर साधना तथा उपदेश ग्रहण करने तक साथ रहे. संत काग बाबा ने आत्म से ब्रम्हज्ञान प्राप्त ज्ञान की प्रभा से मानव मात्र के समस्त दुखों का सुगमता तथा सहजता से निवृति के लिए चतुष्पाद साधना आत्मनिरीक्षण, आत्मसंयम, आत्मानुवेषण तथा आत्मदर्शन का अनुवेषण किया. उन्होंने मनुष्य को एक परमात्मा और एक धर्म का संदेश दिया. उन्होंने कहा सृष्टि की उत्पति उसी एक परमात्मा से हुई है. धर्म भी उसी परमात्मा के साथ है. प्रथम सूत्र के अनुसार मानवेतर प्राणी दुःख से छुटकारा नहीं पा सकता है. मनुष्य दुःख को जान सकता है़ जो जान लेता है. वह दुख से मुक्त हो जाता है.

अंधकार व प्रकाश की तरह दुख व सुख

पूज्य आचार्य गुरुवानंद महाराज कहा अंधकार व प्रकाश की तरह दुख व सुख का संबंध है. दुख अंधकार है तो सुख प्रकाश है. अंधकार प्रकाश का अभाव है सूर्य सभी को देखता है. उसी तरह सुख हीन व्यक्ति के सामने दुःख भास्ता है दुःख रहता नहीं है. सुख वस्तु पर उतना निर्भर नहीं करता है, जितना ज्ञान पर जान जितना कम होगा. वस्तु रहने पर भी उतना अधिक दुःख होगा. अगर धन प्राप्ति से दुःख का अनुभव नहीं होता तो बुद्ध महावीर आदि सतों को धन त्यागने पर दुख का ही अनुभव होता रहता. सुख का अभाव ही दुःख के रूप में अज्ञानियों को अनुभव होता है. जिसने अखंड सुख प्राप्त कर लिया है, वह सम्पूर्ण सृष्टि में घूम जाय तो उन्हें कभी दुःख से भेट नहीं होगी.

वहीं धर्म जड़ में जड़ रूप से तथा चेतन में चेतन रूप से व्याप्त है. जैसे अग्नि का धर्म ताप और पानी का धर्म शीतल है. यदि अग्नि से ताप और पानी से शीतलता निकल जाय तो अग्नि तथा पानी का स्तित्व मिट जायेगा. इसी तरह मनुष्य में वहीं धर्म सत्य अहिंसा तथा प्रेम सगुण रूम में अभिव्यक्त है. सत्य, अहिंसा और प्रेम की भावना मानव के अंदर विराजमान है. मौके पर दर्जनों श्रद्धालुओं प्रवचन सुन कर मंत्रमुग्ध हो गये.

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