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समस्याओं के मकड़जाल में किसान, सिंचाई बनी है चुनौती

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समस्याओं के मकड़जाल में किसान, सिंचाई बनी है चुनौती

ग्वालपाड़ा,सिंचाई के क्षेत्र में पिछड़े हुये ग्वालपाडा प्रखंड में किसानों के लिये सिंचाई एक चुनौती बनी हुई है. प्रखंड क्षेत्र में लगाया गया सरकारी नलकूप जहां शोभा की वस्तु बन कर रह गयी है, वहीं सिंदुवारी से नोहर, ग्वालपाडा, राजपुर सरसंडी होकर गुजरने बाली नहर में 25 से तीस वर्षों के अंतराल में किसानों को पानी देखना सपना हो गया है. वैसे नहर मरम्मती के नाम पर सालो साल लाखों करोड़ों का खर्च होता है, लेकिन सिंचाई के लिये एक बूंद भी पानी नसीब नहीं होता है. यहां के किसान भगवान भरोसे ही कृषि कार्य में अपनी पूंजी लगाते हैं. वैसे किसान अपनी रब्बी कि फसल में सिंचाई की परेशानी झेल चुके हैं. अब खरीफ फसल की सिंचाई के लिये अभी से ही परेशान नजर आ रहे हैं. सबसे बड़ी समस्या यह है, धान का बीचरा गिराने का समय भी बीत रहा है, लेकिन सरकारी नलकूप रहते हुये भी निजी बोरिंग और निजी पंप से से डेढ़ से दो सौ रुपया प्रति घंटा पूंजी लगा कर बीचरा लगा रहे हैं. किसान, रंजन यादव, रामलखन यादव, संतोष झा, नुनु झा, बुदुर सिंह, शंभु सिंह कहते हैं कि आज के समय में किसान हायब्रिड फसल लगाते हैं. इसका समय सीमा निर्धारित है. मॉनसून की बारिश कम होने की स्थिति बीचरा पीला पड़ने लगाता है. कीड़े मकोड़े का प्रकोप बढ़ जाता है. जिससे पैदावर पर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना बनी रहती है. वैसे मॉनसून बारिश की आने की प्रतिक्षा की जा रही है. बताते चलें कि ग्वालपाड़ा प्रखंड क्षेत्र के ग्वालपाड़ा, झलारी सहित अन्य पंचायतों में पूर्व में ही सरकारी नलकूप लगाया गया है. लेकिन सभी नलकूप हाथी का दांत साबित हो रहा है. एक बूंद पानी किसान को नसीब नहीं हो पाता है. ऐसी स्थिति में किसान निजी पंप सेट से उंची रकम चुका कर खेती करते आ रहे. डीजल की कीमत में हुये बढ़ोतरी जहां पांच से सात हजार रुपया प्रति एकड़ सिचाई में खर्च कड़ना पड़ता था वो खर्च अब दोगुना हो गया. सरकारी अमला कुंभकर्णी नींद में सोई हुई है. प्रखंड क्षेत्र होकर तीन नहर गुजरती है. जिसमें बेलदौर वितरणी, खुरहन वितरणी एवं अलमनगर वितरनी शामिल है, लेकिन नहर का केवल नाम ही रह गया है. अनेको जगह नहर छिन्न -भिन्न हो चूका है. इसके बाबजूद नहर से निकले वाली छहर जिसका नामोनिशान सरजमीन पर मिट चूका है, लेकिन मनरेगा का पैसा पानी की तरह बहाया गया है, जबकि नहर से निकलने बाली छहर का वजूद समाप्त हो चुका है. सरकारी अमला को देखना चाहिये कि नहर में पानी आने बाला है या नहीं. जब नहर में पानी आ ही नहीं सकता तो फिर इस छहर बनाने के नाम राजस्व की बर्बादी नहीं तो और क्या हो सकता है. जो भी हो इस क्षेत्र के किसानों की किसानी उपर बाले के ही हाथ में है. किसानों की सुनने वाला कोई नहीं हैं. सिंचाई विभाग को देखना चाहिये कि जिस नहर से सिचाई के लिए पानी छहर में निकलेगा. उस नहर का अनेको जगह मटियामेट हो चूका है. ऐसी स्थिति में छहर बनाने का नाटक तो लोगों धोखा देने के शिवाय और कुछ नहीं हो सकता है.

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