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Home बिहार किशनगंज सम्राट अशोक भवन निर्माण से पहले विवादों में, डिबार संवेदक के साथ एग्रीमेंट पर उठे सवाल

सम्राट अशोक भवन निर्माण से पहले विवादों में, डिबार संवेदक के साथ एग्रीमेंट पर उठे सवाल

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सम्राट अशोक भवन निर्माण से पहले विवादों में, डिबार संवेदक के साथ एग्रीमेंट पर उठे सवाल
नगर पंचायत ठाकुरगंज का प्रशासनिक भवन
ठाकुरगंज (किशनगंज) से बच्छराज नखत की रिपोर्ट

Tender Agreement Dispute: बिहार के किशनगंज जिला अंतर्गत नगर पंचायत ठाकुरगंज की बहुप्रतीक्षित और बहुआयामी ‘सम्राट अशोक भवन’ परियोजना शुरू होने से पहले ही वित्तीय और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के गंभीर भंवर में फंस गई है. सूचना के अधिकार और विभागीय कड़ियों से सामने आए दस्तावेजों ने नगर पंचायत की कार्यप्रणाली पर एक ऐसा बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है, जिससे प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है. पूरा मामला इस बात को लेकर गरमाया हुआ है कि जब संबंधित संवेदक को आधिकारिक तौर पर सरकारी कार्यों के लिए अयोग्य (डिबार) घोषित कर दिया गया था, तो फिर किस आधार और किन परिस्थितियों में उसके साथ इस महत्वपूर्ण योजना का अंतिम अनुबंध (एग्रीमेंट) कर लिया गया?

तीन तारीखों के फेर में फंसा करोड़ों का खेल; एग्रीमेंट की टाइमिंग पर गंभीर सवाल

इस पूरे विवाद की पटकथा मुख्य रूप से तीन तारीखों और उनके बीच के कालखंड के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसने इस सरकारी परियोजना में पारदर्शिता के दावों की पोल खोलकर रख दी है:

  • 20 दिसंबर 2025 (टेंडर का प्रकाशन): नगर पंचायत ठाकुरगंज द्वारा सम्राट अशोक भवन के निर्माण को लेकर विधिवत निविदा (टेंडर) आमंत्रित की गई थी. इस तारीख तक संबंधित संवेदक तकनीकी रूप से पात्र था.
  • 07 मार्च 2026 (डिबार करने का आदेश): संवेदक के किसी अन्य मामले या तकनीकी गड़बड़ी को लेकर लोक स्वास्थ्य प्रमंडल, किशनगंज द्वारा सख्त कार्रवाई की गई और उसे सरकारी टेंडरों से डिबार (अयोग्य) घोषित करने का ब्लैकलिस्टिंग आदेश जारी हुआ.
  • 08 जून 2026 (अंतिम एग्रीमेंट साइन): संवेदक के डिबार होने के बावजूद नगर पंचायत ठाकुरगंज ने नियमों को ताक पर रखकर उसी संवेदक के साथ सम्राट अशोक भवन निर्माण कार्य का फाइनल एग्रीमेंट निष्पादित कर लिया.

93 दिनों का वह रहस्यमयी अंतराल; नियमों के जानकारों ने उठाए सवाल

इस पूरे मामले का सबसे संदिग्ध पहलू डिबार आदेश जारी होने और एग्रीमेंट के बीच का 93 दिनों का लंबा अंतराल है. नियमों के जानकारों और स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का साफ कहना है कि विवाद टेंडर प्रक्रिया की शुरुआत का नहीं है, क्योंकि उस वक्त संवेदक वैध था. असली कानूनी और प्रशासनिक चूक एग्रीमेंट के वक्त हुई है.

सरकारी नियमावली के मुताबिक, किसी भी कार्य का अंतिम वर्क ऑर्डर या एग्रीमेंट आवंटित करते समय संवेदक का पूरी तरह गैर-विवादास्पद और योग्य होना अनिवार्य है. ऐसे में यह सवाल सड़कों से लेकर कार्यालयों तक गूंज रहा है कि क्या लोक स्वास्थ्य प्रमंडल का डिबार आदेश 93 दिनों तक नगर पंचायत कार्यालय नहीं पहुंच पाया, या फिर जानबूझकर फाइलों को दबाए रखा गया?

विजिलेंस और उच्चाधिकारियों तक पहुंची शिकायत; संवेदक ने झाड़ा पल्ला

माफिया राज और वित्तीय अनियमितता की बू: स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकारी खजाने से बनने वाले इस भवन में जनता की गाढ़ी कमाई लग रही है, जहां पारदर्शिता से समझौता किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

इस प्रशासनिक घालमेल की लिखित शिकायत साक्ष्यों के साथ जिला पदाधिकारी (डीएम) किशनगंज और मद्यनिषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग सहित वरीय तकनीकी निगरानी (विजिलेंस) के उच्चाधिकारियों तक पहुंचा दी गई है. शिकायतकर्ता ने एग्रीमेंट को तत्काल प्रभाव से रद्द करने, संवेदक के वित्तीय खातों पर रोक लगाने और इस प्रक्रिया में शामिल दोषी अधिकारियों की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है.

दूसरी तरफ, विवाद गहराता देख संबंधित संवेदक ने इस पूरे मामले से पल्ला झाड़ते हुए कहा है कि उन्हें लोक स्वास्थ्य प्रमंडल द्वारा डिबार किए जाने की कोई आधिकारिक या लिखित सूचना समय पर नहीं मिली थी. बहरहाल, अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन के रुख पर टिकी हैं कि क्या इस करोड़ों की योजना पर निष्पक्ष जांच का हंटर चलेगा या फिर फाइलों के खेल में सच दबा दिया जाएगा.

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