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Home बिहार किशनगंज टिकट काउंटर या ‘गुप्त खिड़की’? ठाकुरगंज स्टेशन पर बिना डिस्प्ले और स्पीकर के टिकट कटवाने को मजबूर रेल यात्री

टिकट काउंटर या ‘गुप्त खिड़की’? ठाकुरगंज स्टेशन पर बिना डिस्प्ले और स्पीकर के टिकट कटवाने को मजबूर रेल यात्री

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टिकट काउंटर या ‘गुप्त खिड़की’? ठाकुरगंज स्टेशन पर बिना डिस्प्ले और स्पीकर के टिकट कटवाने को मजबूर रेल यात्री
टिकट काउंटर

Thakurganj Railway Station: ठाकुरगंज (किशनगंज) से बच्छराज नखत की रिपोर्ट: कटिहार रेल मंडल अंतर्गत ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन का पीआरएस (PRS – आरक्षित) और यूटीएस (UTS – अनारक्षित) टिकट काउंटर इन दिनों यात्रियों के लिए भारी परेशानी और जी का जंजाल बना हुआ है. इस काउंटर से टिकट तो मिल रहा है, लेकिन टिकट कटवाने की पूरी प्रक्रिया किसी ‘रहस्यमयी खेल’ या ‘राज’ से कम नहीं लगती. काउंटर के शीशे के बाहर खड़े यात्रियों को न तो टिकट की वास्तविक राशि दिखाई देती है और न ही अंदर बैठे रेल कर्मी की आवाज साफ सुनाई देती है. नतीजतन, सीमांचल के इस महत्वपूर्ण स्टेशन पर यात्री सिर्फ अपने अंदाज और भगवान भरोसे पैसे के लेन-देन को मजबूर हैं.

“कितना पैसा गया और कितना लौटा, भगवान भरोसे” — पारदर्शिता गायब

स्टेशन पर टिकट लेने पहुंचे आम यात्रियों, महिलाओं और बुजुर्गों का कहना है कि टिकट लेते समय उनके मन में सबसे बड़ा संशय यही रहता है कि वास्तव में उनका कितना किराया लगा और रेल कर्मी ने उन्हें कितने पैसे वापस किए. काउंटर के ठीक बाहर कोई भी डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड (भवन के बाहर किराया दिखाने वाली स्क्रीन) नहीं लगाया गया है, जो रेलवे के नियमों के मुताबिक अनिवार्य होना चाहिए.

कई यात्रियों ने व्यवस्था पर तंज कसते हुए मजाकिया अंदाज में कहा कि ठाकुरगंज स्टेशन पर टिकट हासिल करने के लिए व्यक्ति के पास ‘असाधारण सुनने की शक्ति’ और ‘तेज अनुमान लगाने का दिमाग’ होना बेहद जरूरी है.

भीड़ के समय बनता है कॉमेडी का सीन, पीछे वाले बनते हैं ‘अनुवादक’

स्टेशन पर जब किसी मुख्य ट्रेन के आने का समय होता है और काउंटर पर भीड़ बढ़ती है, तब हालात और भी दिलचस्प व सिरदर्द वाले हो जाते हैं. मोटे शीशे के पार बैठा रेल कर्मी अंदर से कुछ बोलता है, लेकिन बाहर कोलाहल और स्पीकर न होने की वजह से यात्री कुछ और ही समझ बैठते हैं. इसके बाद काउंटर की छोटी सी खिड़की पर:

  • “क्या कहा भैया?”
  • “कितना पैसा हुआ?”
  • “जरा फिर से बोलिए ना!”

का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है. कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है कि टिकट ले रहे यात्री की लाचारी देखकर लाइन में पीछे खड़े अन्य मुसाफिर ‘अनुवादक’ (इंटरप्रेटर) की भूमिका निभाने लगते हैं और कान लगाकर अंदर की आवाज आगे पास करते हैं.

डिजिटल इंडिया के दावों को मुंह चिढ़ाती ठाकुरगंज स्टेशन की हकीकत

स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और रेल संघर्ष समिति के सदस्यों का कहना है कि पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (NFR) आपातकाल या रेलखंडों के रूट डायवर्जन के समय तो ठाकुरगंज-इस्लामपुर रूट को लाइफलाइन की तरह याद करता है, लेकिन जब इस स्टेशन पर बुनियादी सुविधाएं देने की बात आती है, तो सौतेला व्यवहार किया जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले सीधे-साधे यात्रियों और कम पढ़े-लिखके लोगों को इस ‘मूक काउंटर’ के कारण कई बार आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं चलता कि काउंटर से टिकट के सही दाम कटे हैं या नहीं.

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तंज:

ठाकुरगंज के इस अजीबोगरीब टिकट काउंटर को लेकर सोशल मीडिया पर भी स्थानीय युवाओं ने मोर्चा खोल दिया है. लोग मीम्स शेयर करते हुए तंज कस रहे हैं कि — “ठाकुरगंज स्टेशन पर टिकट लेना किसी रेलवे की यात्रा नहीं, बल्कि केबीसी (KBC) की क्विज प्रतियोगिता खेलने जैसा है, जहां हर कदम पर सिर्फ अनुमान लगाना पड़ता है.”

रेल प्रशासन से बेहतर साउंड सिस्टम और डिजिटल डिस्प्ले की मांग

क्षेत्रवासियों और दैनिक यात्रियों ने कटिहार के मंडल रेल प्रबंधक (DRM) से पुरजोर मांग की है कि:

  1. ठाकुरगंज स्टेशन के दोनों टिकट काउंटरों (आरक्षित व अनारक्षित) पर तुरंत आधुनिक डिजिटल फेयर डिस्प्ले (Digital Fare Display) लगाया जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे.
  2. रेल कर्मी और यात्रियों के बीच सुगम बातचीत के लिए टू-वे टॉक-बैक स्पीकर सिस्टम (Two-way Speaker System) बहाल किया जाए.

अब देखना यह होगा कि आधुनिकता का दम भरने वाला रेल प्रशासन ठाकुरगंज के इस ‘मूक काउंटर’ की जायज आवाज को कब तक सुनता है और यात्रियों को इस डिजिटल जंग से निजात दिलाता है.

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