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Home बिहार खगड़िया रोहियार में पीढ़ी दर पीढ़ी कुश्ती है संस्कार, दंगल है परंपरा

रोहियार में पीढ़ी दर पीढ़ी कुश्ती है संस्कार, दंगल है परंपरा

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रोहियार में पीढ़ी दर पीढ़ी कुश्ती है संस्कार, दंगल है परंपरा

– पहलवानों की बस्ती के नाम से राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है चौथम का रोहियार गांव

– दर्जनों पहलवान देश स्तर तक पहुंचाए गांव का नाम

राज किशोर सिंह/

खगड़िया. चौथम प्रखंड क्षेत्र के रोहियार गांव पहलवानों की बस्ती के नाम से प्रसिद्ध है. पहलवानी के बल पर रोहियार गांव की चर्चा देश स्तर पर होती रही है. यह गांव सिर्फ एक सामान्य गांव नहीं, बल्कि वर्षों से पहलवानों की बस्ती के रूप में जाना जाता है. यहां दर्जनों ऐसे चर्चित पहलवान रहते हैं, जिन्होंने जिला से लेकर देश स्तर तक अपनी प्रतिभा का परचम लहराया है. रोहियार गांव में पहलवानी आजादी से पहले होती रही है. उस दौर से ही गांव में अखाड़ा संस्कृति जीवंत रही है. पीढ़ी दर पीढ़ी यहां के युवा पहलवानी से जुड़ते आए हैं. यही वजह है कि आज भी रोहियार गांव में कुश्ती को लेकर खास जुनून देखा जाता है. गांव के कई पहलवान देश स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर पहचान बना चुके हैं.

शिव मंदिर के पास खेत में पहलवान करते हैं अभ्यास

गांव के दर्जनों पहलवान रोहियार गांव स्थित शिव मंदिर के समीप खेत में ही अभ्यास करते हैं. हर वर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर रोहियार शिव मंदिर के समीप भव्य मेला लगता है. इसी दौरान वर्षों से पारंपरिक दंगल का आयोजन भी किया जाता है. जिसमें दूर-दराज से नामी-गिरामी पहलवान भाग लेने पहुंचते हैं. यह दंगल इलाके में आकर्षण का केंद्र बना रहता है.

रोहियार गांव बना पहलवानों की पहचान

रोहियार की पहचान सिर्फ एक गांव के रूप में नहीं हैं. बल्कि पहलवानी की परंपरा के लिए है. बताया जाता है कि रोहियार गांव में आजादी से पहले ही कुश्ती की शुरुआत की गयी थी. पीढ़ी दर पीढ़ी यह परंपरा आगे बढ़ती रही और आज रोहियार को लोग पहलवानों की बस्ती के नाम से जाने जाते हैं. बुजुर्ग बताते हैं कि पहले मिट्टी के अखाड़े में ही अभ्यास होता था. जहां गांव के युवक सुबह-शाम कुश्ती सीखते थे. यह परंपरा आज भी किसी न किसी रूप में जीवित है.

रोहियार गांव की पहचान बनी कुश्ती

रोहियार के पहलवान किसी आधुनिक जिम में नहीं, बल्कि खेतों में पसीना बहाकर अपनी ताकत बढ़ाते हैं. सुबह खेतों में काम, फिर कुश्ती का अभ्यास, यही यहां के पहलवानों की दिनचर्या है. गांव के युवा मानते हैं कि मेहनत और सादा जीवन ही उनकी असली ताकत है. यही वजह है कि सीमित संसाधनों के बावजूद रोहियार के पहलवान जिले से लेकर राज्य स्तर तक अपनी पहचान बना चुके हैं.

दर्जनों राष्ट्रीय स्तर के पहलवान, फिर भी रोहियार पंचायत में नहीं है अखाड़ा

रोहियार गांव से दर्जनों पहलवान राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर पहचान बना चुके हैं, लेकिन रोहियार पंचायत में एक स्थायी अखाड़ा नहीं है. पहलवान खुले मैदान या अस्थायी जगहों पर अभ्यास करने को मजबूर हैं. गांव के लोगों का कहना है कि अगर एक पक्का अखाड़ा बन जाए तो आने वाली पीढ़ी को बेहतर प्रशिक्षण मिल सकेगा और गांव की परंपरा और मजबूत होगी.

जहां पीढ़ी दर पीढ़ी कुश्ती है संस्कार, दंगल है

परंपरा

रोहियार में कुश्ती सिर्फ खेल नहीं, बल्कि संस्कार है. यहां बच्चों को बचपन से ही दंगल देखने और पहलवानों का सम्मान करना सिखाया जाता है. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले दंगल सामाजिक मेल-जोल का बड़ा जरिया हुआ करता था. हार-जीत से ज्यादा महत्व अनुशासन और सम्मान का होता था, जो आज भी गांव की पहचान बना हुआ है.

पहलवानों की बस्ती रोहियार, देश तक गूंजा कुश्ती का दम

रोहियार गांव के पहलवानों ने जिले की सीमाओं को पार कर देश के अलग-अलग हिस्सों में अपनी ताकत का लोहा मनवाया है। कई पहलवान विभिन्न राज्यों में आयोजित दंगलों में हिस्सा लेकर पुरस्कार जीत चुके हैं। इससे न सिर्फ गांव का नाम रोशन हुआ, बल्कि नई पीढ़ी को भी कुश्ती के प्रति प्रेरणा मिली है।

रोहियार के दीपक पहलवान का मिनी ओलंपिक में हुआ था चयन

पहलवानों की बस्ती के नाम से पहचाने जाने वाले रोहियार गांव के चर्चित दीपक पहलवान का 2025 में दंगल के लिए मिनी ओलंपिक में चयन हुआ था. इस उपलब्धि ने न सिर्फ परिवार बल्कि पूरे गांव सहित जिले का नाम रोशन किया था. गांव में कुश्ती की परंपरा को आगे बढ़ाने में राजदीप पहलवान की अहम भूमिका मानी जाती है. राजदीप पहलवान को गांव के सभी पहलवान गुरु के रूप में जानते हैं. उन्हीं के मार्गदर्शन में आज रोहियार के कई युवा पहलवान कुश्ती की बारीकियां सीख रहे हैं. विभिन्न प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रहे हैं.

गांव से निकले कई चर्चित पहलवान ने जिले से बाहर तक बनाई पहचान

रोहियार गांव से रौशन पहलवान, हिमांशु पहलवान, राजू पहलवान, दिव्यांशु पहलवान, शिवानंद पहलवान, दीपन पहलवान, दुर्गेश पहलवान, सत्यम पहलवान समेत दर्जनों पहलवान सक्रिय रूप से कुश्ती में अपना दमखम दिखा रहे हैं. ये सभी पहलवान स्थानीय दंगलों के साथ-साथ जिले और आसपास के क्षेत्रों में आयोजित प्रतियोगिताओं में भाग लेकर गांव की पहचान को आगे बढ़ा रहे हैं.

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