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रीति-रिवाजों के संदेश के साथ जीवंत हुई आदिवासी संस्कृति

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रीति-रिवाजों के संदेश के साथ जीवंत हुई आदिवासी संस्कृति

कोढ़ा प्रखंड क्षेत्र में आदिवासी समुदाय ने पारंपरिक सोहराय पर्व इन दिनों पूरे उत्साह उमंग व परंपरागत तरीके से मनाया जा रहा है. गांव-गांव व प्रमुख चौराहों पर आदिवासी समाज के लोग एकत्र होकर पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य और गीत से अपनी सांस्कृतिक विरासत को जिवित कर रहे हैं. ढोल और मांदर की थाप पर थिरकते युवक-युवतियों से पूरा क्षेत्र उत्सव के रंग में रंगा नजर आ रहा है. आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों और बुद्धिजीवी ग्रामीणों ने बताया कि सोहराय पर्व उनकी आस्था और परंपरा से जुड़ा हुआ है. जिसे वे अपने पूर्वजों के समय से मनाते आ रहे हैं. यह पर्व प्रकृति, पशुधन और जीवन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का प्रतीक है. कहा, आधुनिक समय में भी इस परंपरा को जीवित रखना आदिवासी समाज की सांस्कृतिक चेतना को दर्शाता है. ग्रामीणों के अनुसार सोहराय पर्व की शुरुआत हर वर्ष 9 जनवरी से होती है. अलग-अलग गांवों में विभिन्न तिथियों पर आयोजन होता है. अंत में चौराहे पर सामूहिक रूप से इसे धूमधाम से मनाया जाता है. सामाजिक मेल-मिलाप के साथ-साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों का भी विधिवत पालन किया जाता है. इस अवसर पर भटवारा पंचायत के सरपंच प्रतिनिधि ने सुनील मुर्मू ने कहा कि सोहराय पर्व आदिवासी समाज के लिए खास महत्व रखता है. जनवरी माह से ही पूरे क्षेत्र में इस पर्व को लेकर उत्साह का माहौल बन जाता है. लोग इसमें बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं. पंचायत की मुखिया सुनैना देवी ने कहा कि सोहराय पर्व भाईचारे, आपसी प्रेम और सामाजिक एकता का संदेश देता है. दूर-दराज के रिश्तेदार एकत्र होते हैं. मिल-बैठकर खुशियां साझा करते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे पर्व समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं.

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