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रमजानुल मुबारक का दूसरा अशरा मगफिरत है

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रमजानुल मुबारक का दूसरा अशरा मगफिरत है

बलिया बेलौन जामे मस्जिद अबु बकर सालमारी के इमाम हाफिज इमदादुल हक कासमी रमजानुल मुबारक के दूसरे जुमा की नमाज में तकरीर करते हुए कहा की पूरे रमजानुल मुबारक का महीना में खुदा की रहमत है. यह अजमत व बरकत वाला महीना है. अल्लाह रब्बुल इज्जत ने इस बरकत वाले मुबारक महीने को तीन अशरा में बांटा है. एक रोजा से दस रोजा तक पहला अशरा है. पहला अशरा खुदा की रहमत वाला है. अशरे में खुदा की रहमत नाजिल होती है. 11 रोजा से दूसरा अशरा शुरू होता है. दो रोजा बाद दूसरा अशरा शुरू होने जा रहा है. इस अशरा में खुदाए पाक अपने बंदों की मगफिरत करते हैं. यानी अल्लाह पाक अपने बंदों के गुनाहों को माफ फरमाते हैं. इस अशरा में हमें चाहिए की बारगाहे खुदावंदी में ज्यादे से ज्यादे गुनाहों की माफी के लिए मगफिरत करें. अल्लाह पाक हमारी दुआ कबूल करने वाला रहमान है. 21वीं रोजा से तीसरा अशरा शुरू होता है. तीसरा अशरा जहन्नुम की आग से निजात का है. इस अशरा में अल्लाह रब्बुल इज्जत अपने बंदों को जहन्नुम की आग से बचाते हैं. रमजानुल मुबारक का हर पल बहुत खास है. रमजान का महीना हमें वक्त की पाबंदी का आदत डालता है. रमजानुल मुबारक में वक्त पर सोना, उठना, नमाज अदा करना, सेहरी इफ्तार करना भी इबादत है. रमजान के महीने में फिरता, जकात, शदका जितना तकसीम की जाय, उतना अच्छा है. इस महीने में सत्तर गुणा शवाब जयादे मिलता है. रोजेदार को इफ्तार कराने का बड़ा शवाब है. कोई भी रोजेदार भूखा नहीं, पड़ोसी को इस का ख्याल रखना चाहिए.

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