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मानसून की दस्तक के साथ बजा बाढ़ का सायरन

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मानसून की दस्तक के साथ बजा बाढ़ का सायरन

– गंगा-कोसी के उफान से खतरा बढ़ा फोटो 9 कैप्शन- गंगा किनारे खड़ी नाव

कटिहार के कुरसेला से रिपोर्ट,

मानसून के आगमन की दस्तक के साथ ही कुरसेला क्षेत्र में बाढ़ आपदा का खतरा बढ़ गया है. गंगा सहित कोसी नदी के जलस्तर में लगातार उफान आ रहा है. नदियों के उफान को देखकर क्षेत्र के लोग दहशत में हैं. किसान अभी से खरीफ की भदई फसल डूबने की आशंका से परेशान हैं. धार्मिक मान्यताओं में कहा जाता है कि ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की गंगा दशहरा तिथि से ही गंगा नदी के जलस्तर में उफान शुरू हो जाता है. इस बार भी जलग्रहण क्षेत्रों में हो रही बारिश ने नदियों के उफान को और बढ़ा दिया है. गंगा-कोसी के बाढ़ क्षेत्र की बड़ी आबादी दशकों से तबाही का दंश झेलती आ रही है.

सरकारी प्रयास अब तक नाकाम

बाढ़ आपदा से सुरक्षा के लिए किए गए सरकारी प्रयास अब तक नाकाम साबित हुए हैं. बांधों के बनने-टूटने का सिलसिला पिछले पांच दशकों से चला आ रहा है. कटाव निरोधात्मक उपायों पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी क्षेत्र को पूरी सुरक्षा नहीं मिल पाई है. लाखों-करोड़ों की लागत से बने बांध और सड़कें बाढ़ में टूटकर बर्बाद हो जाती हैं. नतीजा यह कि बाढ़ का आना और तबाही मचाकर चले जाना क्षेत्र की नियति बन चुकी है.

कटाव से गांव विलीन, विस्थापन की कतारें लंबी

भौगोलिक रूप से नदियों के बहाव दिशा में बदलाव से कटाव की समस्या लगातार बढ़ रही है. कटाव के प्रकोप से अब तक आबादी के कई गांव गंगा-कोसी की कोख में समा चुके हैं. नदियों के आगोश में समाते गांवों से विस्थापित परिवारों की कतारें लंबी होती जा रही हैं. शेरमारी, चांयटोला, कमलाकान्ही, गुमटीटोला, मधेली, कटरिया, पत्थलटोला, तीनघरिया, खेरिया, बालूटोला, बसुहार, मजदिया, बाघमारा, मेहरटोला, मलेनियां, रामपुर यादव टोली जैसे गांव नदियों के करीब बसे हैं. इन गांवों पर अस्तित्व का संकट और बाढ़ आपदा का खतरा सबसे ज्यादा है. क्षेत्र के बाकी गांव भी हर साल बाढ़ की तबाही झेलते हैं.

प्रशासन ने दावा किया तैयारी पूरी

राज्य में मानसून प्रवेश कर चुका है और मानसून की दस्तक ने क्षेत्र में बाढ़ का सायरन बजा दिया है. प्रशासन ने बाढ़ आपदा से निपटने के लिए मुकम्मल तैयारी का दावा किया है. अब देखना होगा कि आपदा के समय प्रशासनिक तैयारियां पीड़ितों को कितनी राहत और सहायता पहुंचा पाती हैं. फिलहाल किसान-मजदूर प्राकृतिक आपदा के डर से सहमे हुए हैं.

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