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Home बिहार कटिहार स्पांसरशिप योजना: कटिहार जिले मात्र 39 बच्चे योजना से आच्छादित

स्पांसरशिप योजना: कटिहार जिले मात्र 39 बच्चे योजना से आच्छादित

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स्पांसरशिप योजना: कटिहार जिले मात्र 39 बच्चे योजना से आच्छादित

कटिहार. समाज कल्याण विभाग के निदेशक ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जिला बाल संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक साथ योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर समीक्षा बैठक आयोजित की. इस समीक्षा बैठक में निदेशक ने स्पांसरशिप स्कीम की समीक्षा करते हुए बताया कि कटिहार जिला से मात्र 39 बच्चों को प्रायोजन योजना के तहत लाभ मिल रहा है. जबकि ऐसे बहुत सारे बच्चे है. जिनकी देखभाल करने वाला कोई भी नहीं है. इसके आलावा ऐसे बहुत सारे अभिभावक है, जो सही प्रकार से अपने बच्चो की देखभाल नहीं कर पा रहे है. उन सभी के लिए समाज कल्याण विभाग के तरफ से इस स्पांसरशिप योजना को चलाया गया है. उन्होंने योजना के प्रति प्रचार प्रसार करने का निर्देश दिया. जिला सामाजिक सुरक्षा कोषांग के सहायक निदेशक अमरेश कुमार ने बुधवार को जिला बाल संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक का अतिरिक्त प्रभार लेने के बाद बताया कि इस योजना के तहत राज्य सरकार की ओर से 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चो को आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है. इस योजना के तहत सरकार की ओर से बच्चो को प्रतिमाह 4000 रूपये दिये जाते है. इसका आवेदन जिला बाल संरक्षण इकाई के कार्यालय में जमा कर सकते है. पात्रता प्राप्त आवेदन पर बाल कल्याण समिति के अनुशंसा के बाद जिला पदाधिकारी की अध्यक्षता में गठित प्रायोजन एवं पालन पोषण देखरेख अनुमोदन समिति द्वारा इसकी स्वीकृति प्रदान की जाती है. उन्होंने बताया कि इस योजना का लाभ ऐसे बच्चे जिनके पिता की मृत्यु हो गयी है. मां तलाकशुदा या परिवार से परित्यक्त हो. उन्हें इस योजना का लाभ दिया जाता है. साथ ही ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता या उनमे से कोई एक गंभीर या जानलेवा रोग से ग्रसित हो. ऐसे बच्चे जो बेघर, निराश्रित या विस्थापित परिवार के साथ रह रहे है. ऐसे बच्चे, जो कानून से संघर्षरत है. ऐसे बच्चे जिन्हें बाल तस्करी, बाल विवाह, बालश्रम, बाल भिक्षावृति से मुक्त कराया गया हो. ऐसे बच्चे जो किसी प्राकृतिक आपदा के शिकार हो. ऐसे बच्चे जो दिव्यांग, लापता या घर से भागे हुए है. ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता या उनमे से एक कारागार में निरुद्ध है. ऐसे बच्चे जो एचआईवी या एड्स से प्रभावित है. ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता आर्थिक, शारीरिक या मानसिक रूप से देखभाल के लिए असमर्थ हो. ऐसे बच्चे जो फुटपाथ पर जीवनयापन करने वाले, प्रताड़ित, उत्पीड़ित या शोषित हो.

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