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Home बिहार कैमूर महाशिवरात्रि पर बैजनाथ मंदिर में हजारों श्रद्धालुओं ने चढ़ाया गंगा जल

महाशिवरात्रि पर बैजनाथ मंदिर में हजारों श्रद्धालुओं ने चढ़ाया गंगा जल

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महाशिवरात्रि पर बैजनाथ मंदिर में हजारों श्रद्धालुओं ने चढ़ाया गंगा जल

-खजुराहो की तर्ज पर बने बैजनाथ मंदिर परिसर में आज भी कई प्राचीन मूर्तियां -हर हर महादेव के जयघोष से गूंजा मंदिर परिसर रामगढ़. प्रखंड के अति प्राचीन बैजनाथ मंदिर में महाशिवरात्रि के अवसर पर यूपी व बिहार के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने बाबा भोलेनाथ पर जलाभिषेक कर घंटों पूजा-अर्चना की. इस दौरान श्रद्धालुओं के हर-हर महादेव के जयघोष से पूरा मंदिर प्रांगण भक्तिमय रहा. भोलेनाथ के दर्शन को लेकर श्रद्धालु सुबह से ही हाथों में बेलपत्र, भांग, धतूरा व गंगाजल लिए मंदिर की चौखट पर कतार में खड़े देखे गये. दूर-दराज से आये श्रद्धालुओं की सुविधा को लेकर मंदिर गेट पर पुलिस के जवान व प्रबंध समिति के सदस्य पूरी तरह मुस्तैद रहे. बैजनाथ मंदिर के संबंध में मंदिर के पुजारी राजू मिश्रा ने बताया कि सुबह से दोपहर 12 बजे तक पांच हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने मंदिर में मत्था टेका. उन्होंने बताया कि मंदिर लगभग 700 वर्ष पुराना है. शिव मंदिर के चारों छोर पर आज भी चार कुंड जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौजूद हैं. मंदिर परिसर के बीच रखी गयी खंडित मूर्तियां मां मुंडेश्वरी धाम परिसर में रखी गयी मूर्तियों से मिलती-जुलती हैं. यहां सच्चे मन से पहुंचे भक्तों की हर मुराद भोलेनाथ पूरी करते हैं. जानकारों की मानें तो मंदिर का निर्माण चंदेल वंश के शासन काल में खजुराहो के शिव मंदिर की तर्ज पर कराया गया था. मंदिर ट्रस्ट के सचिव सह शिक्षक चित्रकूट राम ने बताया कि वर्ष 1952 में पंचायती राज गठन के बाद पंचायत के मुखिया यदुनंदन सिंह व सरपंच रामवृक्ष बिंद ने मंदिर के ऊपर बनाये गये गुंबद का निर्माण गांव के लोगों के सहयोग से कराया था. श्रद्धालुओं की बढ़ती आस्था को देखते हुए सरकारी पद पर कार्यरत राम सिंह द्वारा बैजनाथ शिव मंदिर के नाम से ट्रस्ट का गठन किया गया व पुनः चंदा एकत्रित कर मंदिर का बाउंड्रीवॉल बनवाया गया. निर्माण के दौरान परिसर में बिखरे पत्थरों को हटाकर समतल किये जाने पर नीचे सुर्खी-चूना से बना पूरा फर्श मिला, जिसमें नौ हवन कुंड पाये गये. मंदिर के चारों कोनों पर भी कुंड आज जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौजूद हैं. मंदिर अष्टकोणीय संरचना में बना है. आधुनिक युग में भी परिसर में रखी गयी प्राचीन मूर्तियों जैसी प्रतिमाएं कोई दूसरा मूर्तिकार नहीं बना सकता. कुछ पत्थरों पर लिखी गयी भाषा को आज तक कोई पढ़ नहीं पाया है. मंदिर में दो सुरंग भी थे, जिन्हें ग्रामीणों के सहयोग से बंद कर दिया गया.

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