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Kaimur News : रेफरल सेंटर बनकर रह गया जिले का सबसे बड़ा सदर अस्पताल

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Kaimur News : रेफरल सेंटर बनकर रह गया जिले का सबसे बड़ा सदर अस्पताल

भभुआ सदर.

जिले का सबसे बड़ा अस्पताल के रूप में जाना जाने वाला भभुआ का सदर अस्पताल बेहतर इलाज के लिए नहीं, बल्कि एक रेफरल सेंटर के रूप में पहचान बनाता जा रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि यहां पर जब भी थोड़ी भी गंभीर किस्म का मरीज जाता है, तो चिकित्सक उसके इलाज का जोखिम लेने के बजाय उसे रेफर कर देना ज्यादा बेहतर समझते हैं. कोई मरीज अगर सड़क दुर्घटना में आता है और बताता है कि उसके सिर में चोट है, तो उसे तत्काल हायर सेंटर रेफर कर दिया जाता है. मरीज के इलाज में कोई जोखिम या इलाज के लिए जूझने को तैयार नहीं है. इसका नतीजा यह निकलता है कि मरीज को भभुआ से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी तय कर बनारस या दो सौ किलोमीटर की दूरी तय कर पटना जाना पड़ता है. ऐसा भी नहीं है कि यह सिर्फ आम मरीजों के साथ होता है, बल्कि वैसे जो प्रशासनिक पदाधिकारी हैं, पुलिस महकमा में काम करते हैं या फिर नेता मंत्री हैं, सभी को सीधे रेफर कर दिया जाता है. अगर उन्हें सामान्य तरह की बीमारी के अलावा उनकी बीमारी में थोड़ी भी गंभीरता दिखाई, तो चिकित्सक उस पर अपना दिमाग खर्च करने के बजाय रेफर कर देना सबसे ज्यादा बेहतर समझते हैं. समृद्ध लोग रेफर होने पर हायर सेंटर जाकर अपना इलाज तो कर लेते हैं, लेकिन गरीब मरीज हायर सेंटर रेफर होने पर पैसे के अभाव में दर दर की ठोकर खाने को भी विवश हो जाता है. लेकिन, इसे लेकर न कोई सुनने वाला है, न कोई देखने वाला है. रेफर होने के बाद मरीज के पास सदर अस्पताल से पटना या बनारस जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता है.

= सदर अस्पताल ही नहीं, पीएचसी तक की भी है यही स्थितियही स्थिति सिर्फ भभुआ के सदर अस्पताल की नहीं है, बल्कि अनुमंडलीय अस्पताल रेफरल अस्पताल और पीएचसी सीएचसी तक की यही स्थिति है. वहां भी अगर मरीज को साधारण बुखार जुकाम या कटने फटने के अलावा कोई समस्या आयी तो सीधे उनके द्वारा सदर अस्पताल के लिए रेफर कर दिया जाता है. पीएचसी, सीएससी की तो हालत यह है कि डायरिया तक के मरीजों को सदर अस्पताल रेफर कर दिया जाता है. सदर अस्पताल के चिकित्सक अक्सर या शिकायत सिविल सर्जन से कहते नजर आते हैं कि साधारण रूप से बीमार मरीज को भी पीएचसी या अनुमंडली अस्पताल पर यह इलाज नहीं किये जाने के कारण सदर अस्पताल रेफर किया जाता है और यहां पर अनावश्यक बोझ बढ़ जाता है. इससे अन्य मरीजों का बेहतर इलाज नहीं हो पता है और यही स्थिति सदर अस्पताल की ही है, जहां थोड़े भी गंभीर मरीज का उपचार नहीं किये जाने के कारण रेफर किये जाने पर कई बार बनारस के लोग मरीज की ठीक-ठाक स्थिति देख भर्ती करने के बजाय उन्हें दवा देकर वापस लौटा देते हैं. और कहते भी हैं कि इस मरीज को कोई गंभीर समस्या नहीं है. इसका इलाज वहीं पर संभव था. इसे लेकर इतना परेशान होने की जरूरत आप लोगों को नहीं था. आप इसे लेकर वापस चले जाएं. थोड़ा बहुत दवा लिख प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें वापस लौटा देते हैं= आइसीयू से लेकर वेंटिलेटर तक की है सुविधाआपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भभुआ सदर अस्पताल में आइसीयू से लेकर वेंटिलेटर तक की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन इसका इस्तेमाल शायद ही कभी होता है. वेंटिलेटर का इस्तेमाल तो आज तक नहीं किया गया है. आइसीयू और वेंटीलेटर हाथी का दांत बनकर रह गया है. सरकार की अच्छी खासी राशि इन मशीनों के खरीदारी और आइसीयू के बनने पर हुई है. लेकिन, इसका इस्तेमाल नहीं होने के कारण यह मशीन भी बगैर इस्तेमाल हुए कबाड़ बनता जा रहा है. सदर अस्पताल में इलाज की बड़ी-बड़ी मशीन कई प्रकार की उपलब्ध है. लेकिन वह सिर्फ स्टोर की शोभा बढ़ा रही है. गंभीर मरीजों के लिए खरीदे गये महंगे महंगे उपकरण गंभीर मरीजों के लिए किसी काम का नहीं है. क्योंकि इस चिकित्सकों के द्वारा मरीज की थोड़ी भी स्थिति गंभीर हुई, तो सीधे उन्हें रेफर कर दिया जाता है.

= मरीज के रेफर होने पर किसी का नहीं है कोई ध्यानबगैर कोई समुचित कारण के लगातार मरीजों के रेफर होने पर स्वास्थ्य विभाग के किसी भी वरीय अधिकारी का कोई भी ध्यान नहीं है. इसे लेकर न कभी कोई गंभीरता से समीक्षा की गयी न ही मरीज के केस स्टडी की समीक्षा कर इसे देखने की कोशिश की गयी कि मरीज वास्तव में रेफर करने योग्य था या उसे अनावश्यक रूप से रेफर कर दिया गया है. इसे कोई देखने वाला नहीं है. इसका नतीजा है कि पीएचसी से लेकर सदर अस्पताल तक बगैर किसी गंभीर स्थिति के कई मरीजों को अनावश्यक रूप से रेफर कर मरीज के परेशानी को बढ़ा दी जा रही है. अगर पीएचसी से लेकर सदर अस्पताल तक रेफर होने वाले मरीजों की स्थिति की समीक्षा सिविल सर्जन या स्वास्थ्य विभाग के आलाधिकारियों के द्वारा किया जाए, तो निश्चित रूप से इलाज की गुणवत्ता जहां बढ़ेगी. वहीं, दूसरी तरफ रेफर होने वाले मरीजों की संख्या में भी कमी आयेगी और मरीज भी कम परेशान होंगे.

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