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Home बिहार कैमूर फाइलों में ही ”हरी-भरी” रही पोषण वाटिका, डकार ली गयी लाखों की राशि

फाइलों में ही ”हरी-भरी” रही पोषण वाटिका, डकार ली गयी लाखों की राशि

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फाइलों में ही ”हरी-भरी” रही पोषण वाटिका, डकार ली गयी लाखों की राशि
सांकेतिक तस्वीर

जिले के 354 सरकारी विद्यालयों में धरातल पर न सब्जियां दिखीं और न ही क्यारियां दोबारा राशि आवंटन के बाद भी नहीं बदली तस्वीर, जांच के घेरे में विभागीय अधिकारी व शिक्षक लाखों खर्च के बाद बच्चों को थाली में ताजी व हरी सब्जियां नहीं दिखी, न ही लेखा-जोखा भभुआ नगर. जिले के 354 सरकारी विद्यालयों में मध्याह्न भोजन के साथ बच्चों को ताजी व हरी सब्जियां उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गयी पोषण वाटिका योजना आज बदहाली की मिसाल बन चुकी है. योजना के तहत पूर्व में राशि दी गयी थी, इसके बाद एक बार फिर से योजना को चालू करने के लिए शिक्षा विभाग द्वारा प्रत्येक विद्यालय को 5,000 रुपये की राशि आवंटित की गयी है, लेकिन हकीकत यह है कि दूसरी बार भी राशि खर्च होने के बावजूद अधिकांश विद्यालयों में पोषण वाटिका सिर्फ कागजों में ही हरी-भरी नजर आ रही है. जमीन पर न तो क्यारियां दिखती हैं और न ही सब्जियों की खेती के कोई संकेत ही दिखते हैं. जिले के लगभग सभी प्रखंडों में यही हाल है, जहां योजना का लाभ बच्चों तक पहुंचने के बजाय फाइलों में दबकर रह गया है. विभाग के पास नहीं है कोई ठोस आंकड़ा सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिले में कितने विद्यालयों में वास्तव में पोषण वाटिका संचालित हो रही है, इसका कोई स्पष्ट लेखा-जोखा शिक्षा विभाग के पास उपलब्ध नहीं है. लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी यह बताने में विभाग असमर्थ है कि कितने स्कूलों में बच्चों की थाली तक ताजी सब्जियां पहुंच रही हैं. इससे न सिर्फ विभागीय लापरवाही उजागर हो रही है, बल्कि योजना की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. स्थानीय स्तर पर प्रधानाध्यापकों व संबंधित अधिकारियों द्वारा राशि के उपयोग की कोई प्रभावी जांच नहीं की गयी, जिससे योजना अपने मूल उद्देश्य से भटक कर रह गयी है. मिलीभगत व अनियमितता के गंभीर आरोप योजना की मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह आशंका भी गहराती जा रही है कि पोषण वाटिका के नाम पर आवंटित राशि अधिकारियों व कुछ प्रधानाध्यापकों की मिलीभगत से गटक ली गयी है. न तो समय-समय पर भौतिक सत्यापन कराया गया और न ही उपयोगिता प्रमाण पत्र की सख्ती से जांच हुई. इसका नतीजा यह हुआ कि बच्चों के पोषण सुधार के लिए बनायी गयी यह योजना भी भ्रष्टाचार व उदासीनता की भेंट चढ़ती नजर आ रही है. अब सवाल यह है कि क्या शिक्षा विभाग इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच करायेगा, या फिर पोषण वाटिका यूं ही कागजों में फलती-फूलती रहेगी. गौरतलब है कि योजना के तहत घेराबंदी व बीजों की खरीद के लिए प्रति विद्यालय 5-5 हजार रुपये आवंटित किये गये थे, ताकि बच्चे ताजी सब्जियां प्राप्त कर सकें. जिम्मेदार अधिकारी मौन, आंकड़ों का अभाव पोषण वाटिका योजना की वास्तविक स्थिति को लेकर जब डीपीओ मनीष कुमार से यह पूछा गया कि जिले में कितने विद्यालयों में पोषण वाटिका संचालित हो रही है, तो वह सटीक आंकड़े देने में असमर्थ नजर आये. बार-बार पूछे जाने के बावजूद उन्होंने न तो संचालित विद्यालयों की संख्या बतायी और न ही कोई जानकारी साझा कर सके. इससे साफ प्रतीत होता है कि शिक्षा विभाग के पास भी जिले के कितने सरकारी विद्यालयों में वास्तव में यह योजना चल रही है, इसका कोई ठोस रिकॉर्ड मौजूद नहीं है. लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद विभागीय स्तर पर निगरानी का अभाव योजना की गंभीर खामियों को उजागर कर रहा है.

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