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Home बिहार कैमूर शिक्षा विभाग में ‘चोरी-चोरी, चुपके-चुपके’ चल रहा है प्रतिनियुक्ति का खेल

शिक्षा विभाग में ‘चोरी-चोरी, चुपके-चुपके’ चल रहा है प्रतिनियुक्ति का खेल

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शिक्षा विभाग में ‘चोरी-चोरी, चुपके-चुपके’ चल रहा है प्रतिनियुक्ति का खेल
सांकेतिक तस्वीर

छात्र-शिक्षक अनुपात को दरकिनार कर चहेतों को लाभ व दूसरे को दूर भेजने की चर्चा =दूरदराज भेजे जा रहे शिक्षक, पास के स्कूलों को किया जा रहा है नजरअंदाज =50 से 60 किलोमीटर दूर शिक्षकों की की जा रही है प्रतिनियुक्ति, गुरुजी परेशान भभुआ नगर. जिले में शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. यहां एक ओर कई विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात के हिसाब से पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हैं, वहीं दूसरी ओर 50 से 60 किलोमीटर दूर दूसरे प्रखंडों में शिक्षकों को प्रतिनियुक्त किया जा रहा है. हैरानी की बात यह है कि जिस पंचायत या आसपास के विद्यालयों में शिक्षक अपेक्षाकृत अधिक हैं, वहां से समायोजन करने के बजाय दूसरे प्रखंडों से शिक्षकों को भेजा जा रहा है. इससे यह आशंका गहराने लगी है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी न होकर सुनियोजित खेल का हिस्सा है. शिक्षा विभाग में बीते एक महीने से चोरी-चोरी, चुपके-चुपके प्रतिनियुक्ति का खेल जारी है. इस खेल में केवल बाबू ही नहीं, अधिकारी तक भी शामिल हैं. बीमारी की गुहार भी बेअसर, चांद से रामगढ़ भेजे गये शिक्षक प्रतिनियुक्ति की इस प्रक्रिया में मानवीय पहलू भी दरकिनार होता दिख रहा है. चांद के हमीरपुर से एक शिक्षक को 60 किलोमीटर दूर रामगढ़ प्लस टू आदर्श बालिका हाइस्कूल में प्रतिनियुक्त कर दिया गया. संबंधित शिक्षक ने जिला शिक्षा पदाधिकारी को पत्र लिखकर व मिलकर गुहार लगायी कि वे हेपेटाइटिस-बी जैसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हैं और इतनी दूर नियमित आना-जाना उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा. बावजूद इसके अब तक राहत नहीं मिली. सवाल उठता है कि क्या विभागीय आदेशों में मानवीय संवेदना के लिए कोई स्थान नहीं बचा है? सुविधा शुल्क से रद्द होती प्रतिनियुक्ति! नाम नहीं छापने की शर्त पर शिक्षा विभाग में बैठे अन्य कर्मी व कुछ शिक्षकों ने बताया कि प्रतिनियुक्ति का यह खेल यहीं खत्म नहीं होता. पहले शिक्षकों को दूर-दराज विद्यालयों में भेज दिया जाता है, फिर एक महीने के भीतर प्रतिनियुक्ति रद्द कराने के नाम पर कथित तौर पर सुविधा शुल्क की मांग की जाती है. परेशान शिक्षक कार्यालयों का चक्कर काटते हैं और अंततः कथित सुविधा शुल्क देने के बाद ही प्रतिनियुक्ति रद्द की जाती है. हालांकि, ऐसे मामलों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गयी है, लेकिन यदि आरोप सही हैं तो यह शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल है. जवाबदेही किसकी? व्यवस्था पर उठे बड़े प्रश्न सबसे बड़ा सवाल यह है कि जहां शिक्षकों की वास्तविक कमी है, वहां स्थानीय स्तर पर संतुलन क्यों नहीं बनाया जा रहा? क्यों 30-40 किलोमीटर या 60 किलोमीटर दूर से शिक्षकों को बुलाया जा रहा है? क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है या फिर सुनियोजित तंत्र? शिक्षा विभाग की इस कार्यशैली से न केवल शिक्षक परेशान हैं, बल्कि छात्रों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है. जरूरत है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, छात्र-शिक्षक अनुपात के आधार पर पारदर्शी नीति बनायी जाये व दोषी पाये गये लोगों पर सख्त कार्रवाई हो, ताकि शिक्षा व्यवस्था में भरोसा कायम रह सके. शिक्षकों की कमी वाले स्कूलों के लिए हो रही प्रतिनियुक्ति : डीइओ शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति को लेकर उठ रहे सवालों पर जिला शिक्षा पदाधिकारी राजन कुमार ने स्पष्ट किया कि कल्याण विभाग द्वारा संचालित आवासीय विद्यालयों व अन्य उन स्कूलों में, जहां शिक्षकों की कमी है, शैक्षणिक गतिविधियां बाधित न हों, इसके लिए प्रतिनियुक्ति की जा रही है. उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में यह विशेष ध्यान रखा जा रहा है कि जिन विद्यालयों में किसी एक विषय के दो शिक्षक कार्यरत हैं, वहीं से एक शिक्षक को प्रतिनियुक्त किया जाये. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई शिक्षक गंभीर बीमारी से ग्रसित है व आवेदन देता है, तो उसके मामले पर मानवीय आधार पर विचार किया जायेगा.

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