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Home बिहार कैमूर कागजों पर बन रही रणनीति, प्रशासन की अनदेखी व सुस्ती से नहीं बदल रही शहर की व्यवस्था

कागजों पर बन रही रणनीति, प्रशासन की अनदेखी व सुस्ती से नहीं बदल रही शहर की व्यवस्था

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कागजों पर बन रही रणनीति, प्रशासन की अनदेखी व सुस्ती से नहीं बदल रही शहर की व्यवस्था

= लाख प्रयास के बावजूद नहीं हट रहा शहर की सड़कों से अतिक्रमण व अवैध खड़े वाहन = एसडीएम के डेडलाइन तय किये जाने के बावजूद नगरपालिका परिसर में नहीं गया फल मंडी नो-पार्किंग के बोर्ड के नीचे ही खड़े हो रहे वाहन, मूकदर्शक बनी ट्रैफिक पुलिस अतिक्रमण व इ-रिक्शा स्टैंड के अभाव में रेंगने को मजबूर है शहर की रफ्तार भभुआ सदर. आम तौर पर शहर में यातायात और अतिक्रमण को व्यवस्थित करने के लिए नो पार्किंग, नो इंट्री आदि नियमों को लेकर प्रशासन से लेकर नागरिक तक सभी संजीदा होते है, नियमों का पालन कराने वाली पुलिस भी इसकी निगरानी को लेकर गंभीर नजर आती है. लेकिन यह सभी बातें भभुआ शहर के ट्रैफिक के लिए सिर्फ कागजी बयान बाजी ही है. क्योंकि, इन शहरों में जहां नो पार्किंग लिखा होता है वहां पर वाहन खड़े रहते है. सड़क पर वाहनों के चलने की जगह है, तो वहां मनमानी पार्किंग बना वाहन खड़े किये जा रहे हैं. शहर में ऐसा लगता हैं जैसे मानो शहर हर तरफ मनमर्जी से चल रहा है और सबसे बड़ी बात यह है कि कुछ कार्रवाई कर इस मनमर्जी के नियमों से जिम्मेदार भी मुंह फेरे हुए हैं. ऐसे में शहर में चलने वाला ट्रैफिक दिन के व्यस्त समय में जाम की समस्या से लगभग हर दिन दो चार हो रहा है. रोज की समस्या के बाद भी हालत जस के तस है. व्यवस्था का सबसे बड़ा उदाहरण शहर के मुख्यमार्ग पर स्थित बैंक भी हैं, जहां पार्किंग का भी कोई प्रबंध नहीं है. बैंक आने वाले ग्राहक बीच सड़क तक अपने वाहन खड़े करके बैंक जाते हैं और अपना काम पूरा होने के बाद ही वाहन हटाते है. इस बीच सड़क का आधे से जाता हिस्सा दुपहिया व चौपहिया वाहनों का पार्किंग स्थल बनकर रह जाता है, तो अतिक्रमण भी एक समस्या बन रही है. अब ऐसे में सड़क पर चलने वाले वाहनों के लिए जगह ही नहीं बचती है. ऐसे में वाहन चालकों को रेंग रेंग कर निकलना मजबूरी बन जाता है. = वर्षों से चला आ रहा बैठकों का दौर, समस्या जस की तस चरमरायी यातायात व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जिला और पुलिस व नगर पर्षद के वरीय अधिकारियों द्वारा पिछले कई वर्षो से पहल की जा रही है. शहर में अतिक्रमण और लचर यातायात व्यवस्था से लोगों को जाम से निजात दिलाने के लिए वरीय पदाधिकारियों की कई बार हुई बैठक में योजनाएं भी बनायी गयी. योजनाओं को अमलीजामा के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक व पुलिस पदाधिकारियों द्वारा इस दिशा में प्रयास भी किया गया, लेकिन शहर की आधारभूत संरचनाओं के आगे सारा प्रयास अब तक विफल रहा. विफलता का ही परिणाम हैं कि आज भी शहर में चलनेवालों ऑटो व इ रिक्शा सहित सवारी वाहनों के लिए एक अदद स्टैंड के लिए जगह तक नही ढूंढ़ा जा सका. महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जागरूकता के लिए हर साल सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जाता है. लेकिन, भभुआ और मोहनिया शहर के लोगों पर इस पहल का असर पड़ा हो, ऐसा जान नहीं पड़ता. क्योंकि, न तो वाहन चालकों द्वारा यातायात नियमों का पालन किया जा रहा है और न ही पुलिस द्वारा सख्ती से पालन करवाने की दिशा में ही कोई ठोस पहल की जा रही हैं. =चौक चौराहों पर ठेले लगने से जाम की समस्या इधर, भभुआ एसडीएम अमित कुमार ने शहर को जाम से मुक्ति दिलाने के लिए शहर के फुटपाथी फल व सब्जी दुकानदारों के साथ बैठक कर उन्हें एकता चौक, पटेल चौक सहित शहर के अन्य स्थानों पर दुकान लगाने की जगह नगरपालिका परिसर के मैदान में फल की दुकान लगाने का निर्देश दिया था और इसके लिए नगर पर्षद को एक कार्ययोजना तैयार करने को कहा था. इसके लिए डेडलाइन भी तय की गयी थी, लेकिन एक माह से अधिक हो गये अभी भी फलों की दुकान चौक चौराहों पर लग रहे है, जो जाम की समस्या का कारण बन रहे है. = मूकदर्शक बने ट्रैफिक पुलिस के सामने खड़े कर देते हैं वाहन शहर को जाम मुक्त कराने के लिए नगर पर्षद और पुलिस व परिवहन विभाग पिछले कई साल से लगातार योजनाएं बनाता आ रहा है. इस बीच भभुआ के चौक चौराहों पर ट्रैफिक को व्यवस्थित रखने के लिए ट्रैफिक पुलिस की भी व्यवस्था कर दी गयी है, लेकिन नतीजा अब तक सिफर ही रहा है. इसका कारण योजनाओं का सही से क्रियान्वयन न होना हैं. क्योंकि, प्लान बनने के शुरूआत में दो-चार दिन तो उसका असर शहर में खूब दिखता है, लेकिन इसके बाद वही ढ़ाक के तीन पात जैसी स्थिति हो जाती है. ट्रैफिक कर्मी भी अपने लापरवाह अंदाज में आ जाते हैं, उन्हें देखने से स्पष्ट प्रतीत होता हैं कि, जाम लगता है तो लगने दो उनका इससे क्या वाश्ता. मोहनिया का स्टूवरगंज हो या फिर भभुआ का एकता चौक, इन स्थानों पर ट्रैफिक पुलिस के जवानों के रहने के बावजूद उनके सामने ही ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए वाहन खड़े रहते हैं या खड़े कर घंटों वैसे ही छोड़ दिये जाते हैं.

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