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Home बिहार कैमूर बुजुर्गों की गुहार, साहेबजी मैं जिंदा हूं…

बुजुर्गों की गुहार, साहेबजी मैं जिंदा हूं…

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बुजुर्गों की गुहार, साहेबजी मैं जिंदा हूं…
सांकेतिक तस्वीर

कागजों में मरे, हकीकत में जिंदा. दुर्गावती प्रखंड में सिस्टम की बड़ी चूक से बुजुर्गों की पेंशन बंद सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिये गये दर्जनों बुजुर्ग, पेंशन बंद होने से भुखमरी की कगार पर प्रशासनिक लापरवाही ने छीना बुढ़ापे का आखिरी सहारा, जिंदा लोग पूछ रहे हैं-हम मरे कैसे. दुर्गावती. जरा सोचिए. सांसें चल रही हैं, आंखें देख रही हैं, हाथ-पैर काम कर रहे हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में मर चुके हैं. यह किसी कहानी का दृश्य नहीं, बल्कि कैमूर जिले के दुर्गावती प्रखंड की कड़वी हकीकत है. यहां प्रशासनिक चूक या सिस्टम की खामी ने कई बुजुर्गों को जीते-जी ‘मृत’ घोषित कर दिया है, जिससे उनकी सामाजिक सुरक्षा पेंशन भी बंद हो गयी है. जबकि, इन बुजुर्गों के लिए पेंशन ही बुढ़ापे का आखिरी सहारा था. सरकारी सिस्टम की लापरवाही से कागजों में मौत दर्ज होते ही वह सहारा भी छिन लिया गया. कोई बैंक जाता है तो भुगतान नहीं मिलता, कोई जीवन प्रमाणीकरण कराने पहुंचता है, तो सूची से नाम ही गायब बताया जाता है. लाख प्रयास के बाद भी मृत घोषित किये जाने के कारण प्रखंड कार्यालय के सामाजिक सुरक्षा कोषांग में भी उनके नाम रजिस्टर में नहीं मिलते. ऐसे बेबस बुजुर्ग बस एक ही सवाल पूछ रहे हैं—“साहेबजी, जब हम जिंदा हैं तो फिर मरे कैसे.” इधर, इसे लेकर पीड़ितों का कहना है कि प्रखंड विकास पदाधिकारी व जिला प्रशासन तक फरियाद लगायी गयी, लेकिन अब तक उन्हें स्थायी समाधान नहीं मिल सका है. पेंशन बंद होने से रोजमर्रा की जरूरतों के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है. इस तरह के मामले सामने आने के बाद जिले की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं. यह केवल तकनीकी गलती नहीं, बल्कि गरीब व असहाय बुजुर्गों के साथ एक क्रूर मजाक जैसा है. अब देखना है कि प्रशासन कब इन बुजुर्गों को कागजों में दोबारा ‘जिंदा’ करता है. “हुजूर. सिस्टम ने मेरी जिंदा मां को मार डाला” ऐसा ही एक मार्मिक मामला चेहरिया पंचायत के बहेरा गांव निवासी 85 वर्षीय धनेश्वरी देवी का सामने आया है. सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें मृत दिखा दिये जाने से उनकी सामाजिक सुरक्षा पेंशन रोक दी गयी है. उनके पुत्र व युवा समाजसेवी ठाकुर मल्लाह उनके जीवित होने का प्रमाण लेकर दफ्तर-दर-दफ्तर भटक रहे हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उनकी सुनने वाला शायद कोई नहीं है, न ही कोई संवेदनशील नजर आ रहा है. ठाकुर मल्लाह का कहना है कि सिस्टम की संवेदनहीनता ने ही उनकी मां को कागजों में मार डाला. उन्होंने बताया कि अगस्त 2022 से अगस्त 2024 तक व फिर सितंबर 2025 से अब तक दो बार ऑनलाइन रिकॉर्ड में उनकी मां को मृत दर्शाया गया, जिसके कारण महीनों तक उन्हें पेंशन नहीं मिला. बैंक से जानकारी लेने पर भी यही बताया गया कि सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित होने के कारण पेंशन बंद कर दिया गया है. यह समस्या केवल धनेश्वरी देवी तक सीमित नहीं है. दुर्गावती प्रखंड में फेंकू मियां, झेंगटू केवट सहित दर्जनों ऐसे मामले सामने आये हैं, जो हकीकत में जिंदा हैं और चल-फिर भी रहे हैं, लेकिन कागजों में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया है. क्या कहते हैं पदाधिकारी इस संबंध में पूछे जाने पर जिला सामाजिक सुरक्षा कोषांग निदेशक हिमांशु पांडे ने बताया कि कभी-कभार तकनीकी चूक के कारण इस तरह की समस्या हो जाती है. ऐसे लोग तत्काल आवेदन करें, विभाग द्वारा इसे तुरंत सुधार किया जायेगा. साथ ही इसकी भी पूरी जानकारी ली जायेगी कि ऐसा किस कारण से व कैसे हुआ. अगर यह जानबूझकर किया गया साबित होता है तो संबंधित कर्मियों पर सख्त कार्रवाई की जायेगी.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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