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वनवासियों के आशियानों को पूरा होने की जगी आस

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वनवासियों के आशियानों को पूरा होने की जगी आस

भभुआ. पिछले नौ वर्षों से लटक रहे जिले के पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले 302 वनवासियों के स्वीकृत अपूर्ण सरकारी आवास को अब पूर्ण करने की आस जग गयी है. जिला प्रशासन ने सरकार से इन वनवासियों के अपूर्ण आवासों में कंक्रीट की छत के जगह जीआइ सीट का प्रयोग करने की अनुमति मांगी है. आवासों को पूर्ण करने के मामले में जिले के 11 प्रखंडों में सबसे निचले पैदान पर अधौरा प्रखंड शामिल है. गौरतलब है कि जिले में प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण में सरकार द्वारा लगातार प्रयास किया जाता है कि स्वीकृत लाभुकों के आवास का निर्माण तय समय सीमा में पूरा करा दिया जाये. इसे लेकर सरकार समय समय पर विशेष अभियान भी चलाती रही है और सरकार स्तर से लेकर जिला स्तर तक की बैठकों और वीसी में प्रखंड विकास पदाधिकारियों को अपूर्ण आवासों को पूर्ण कराने को लेकर निर्देश जारी किया जाता रहा है. बावजूद इसके जिले के पहाड़ी प्रखंड अधौरा और चैनपुर प्रखंड में कई लाभुकों द्वारा आज तक अपने आवासों को पूर्ण नहीं किया जा सका है. क्योंकि, विभिन्न भौगोलिक और आर्थिक कारणों के कारण पहाड़ी इलाकों में वन वासियों का आवास पिछले नौ साल से अपूर्ण चल रहा है. लेकिन अब इन आवासों के पूर्ण होने की संभावना जग गयी है. जिला प्रशासन ने अब उन वनवासियों के ऐसे आवास जिनका निर्माण पिछले नौ सालों के बीच लाभुकों द्वारा छत या लेंटर तक कराके आधा-अधूरा छोड़ दिया है. उन वनवासियों के आवास को छत की ढलाई के जगह जीआइ सीट का प्रयोग करने की अनुमति देने को ले ग्रामीण विकास विभाग बिहार सरकार पटना को पत्र लिखा है. ताकि अधौरा और चैनपुर के वनवासियों के ऐसे अपूर्ण आवासों को जीआइ सीट से ढंक कर पूर्ण कराया जा सके. इधर, इस संबंध में ग्रामीण विकास विभाग के एमआइएस पदाधिकारी सुधीर पांडेय ने बताया कि अधौरा और चैनपुर प्रखंड में बहुत से लाभुकों के आवास वित्तीय वर्ष 2016-17 से लेकर अब तक पूर्ण नहीं किये जा सके हैं. इसमें अधौरा तथा चैनपुर प्रखंड की पहाड़ी पंचायत डुमरकोन और रामगढ़ पंचायत को मिलाकर 300 से उपर लाभुकों के अपूर्ण आवास शामिल है. = आवासों पूर्णता को ले सबसे निचले पायदान पर है पहाड़ी प्रखंड अधौरा जिले में प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण में उग्रवाद प्रभावित पहाड़ी प्रखंड अधौरा सबसे निचले पायदान पर वर्षों से लगातार चल रहा है. आज की तारीख में भी अगर आंकडों को देखें तो जिले में वित्तीय वर्ष 2016-17 से लेकर अब तक पहाड़ी प्रखंड अधौरा में 298 लाभुकों के आवास अपूर्ण चल रहे हैं. जबकि, यहां के लाभुकों द्वारा प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण या तो प्रथम किस्त लेने के बाद या तो दूसरा किस्त लेने के बाद या फिर तीसरा किस्त लेने के बाद आवास का निर्माण नहीं कराया गया है. इस प्रखंड में अधिक अपूर्ण आवासों की संख्या लगातार बनी रहने या धीमी गति से पूर्ण होने के कारण राज्य स्तर पर आवास योजना की रैंकिंग में जिले को झेंप भी उठाना पड़ता है. ऐसे में अगर जीआइ सीट के प्रयोग की अनुमति सरकार से मिल जाती है, तो इन वनवासियों को भी सिर ढकने का ठिकाना मिल जायेगा. क्या कहते हैं डीडीसी इधर, इस संबंध में उप विकास आयुक्त ज्ञान प्रकाश ने बताया कि अधौरा और चैनपुर प्रखंड के आवास योजना के लाभुकों को भोगौलिक और आर्थिक कठिनाइयां से आवासों को पूर्ण करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है. उसे दूर करने के लिए सरकार से आवासों में छत की जगह जीआइ सीट के प्रयोग की अनुमति मांगी गयी है. इस पर सरकार स्तर से संज्ञान लिया जा रहा है. उम्मीद है जल्द ही पहाड़ी क्षेत्र के लिंटर स्तर या छत स्तर तक बनाये गये लाभुकों के आवास पर जीआइ सीट प्रयोग करने की अनुमति मिल जायेगी और आवासों को तेजी से पूर्ण कर लिया जायेगा. इन्सेट भौगोलिक और आर्थिक कारणों से नहीं पूर्ण हो पाते लाभुकों के आवास फोटो40 अधौरा प्रखंड के वनवासी का कच्चा आवास प्रतिनिधि, भभुआ. जिले के पहाड़ी प्रखंड अधौरा और चैनपुर में आवास योजना के स्वीकृत लाभुक कुछ भौगोलिक और आर्थिक कारणों से अपने आवासों को पूरा नहीं कर पाते हैं. इसे लेकर प्रखंड विकास पदाधिकारी अधौरा द्वारा अपूर्ण आवासों के लाभुकों से बात करने के बाद जिला प्रशासन को प्रतिवेदित भी किया जा चुका है. इसमें कहा गया है कि अधौरा प्रखंड में निर्माण सामग्री क्रय करने हेतु बाजार व ईंट भट्ठा 50 से 60 किलोमीटर दूर है. इसके कारण वहां से सामग्री लाकर आज महंगाई के दौर में छत की ढलाई संभव नहीं है. इसी तरह भौगोलिक विषमता के कारण प्रखंड की सभी पंचायतों में आवागमन की सुविधा अच्छी नहीं होने से भी कठिनाई का सामना करना पड़ता है. यही नहीं प्रखंड में कुछ माहों तक भूजल स्तर भागने से पेयजल और आवासों को पूर्ण करने के लिए पानी की आवश्यकता भी आवासों को पूर्ण करने में बाधक बन जाती है. साथ ही आदिवासियों की मानसिकता भी पूर्व से कच्चे मकान में रहने के चले आ रहे के कारण इस आदिवासी बहुल क्षेत्र के लोग कच्चे मकान में ही रहना पसंद करते हैं.

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