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पैक्स चुनाव को लेकर अपने करीबियों को मतदाता बनाने की कवायद तेज

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पैक्स चुनाव को लेकर अपने करीबियों को मतदाता बनाने की कवायद तेज

मोहनिया सदर. आगामी पैक्स चुनाव को लेकर अभी से अपने करीबी लोगों का नाम पैक्स की मतदाता सूची में जोड़ने व वैसे लोग जिनसे पैक्स अध्यक्षों को अपनी कुर्सी पर खतरा मंडराने की संभावना दिखायी दे रहा है, उनका नाम पैक्स की मतदाता सूची से विलोपित करने का खेल अंदर ही अंदर शुरू हो गया है. हालांकि अभी पैक्स चुनाव को लेकर किसी तरह की अधिसूचना जारी नहीं हुई है, लेकिन आगामी नवंबर महीने में पैक्स चुनाव होने की संभावना व्यक्त की जा रही है. पैक्स चुनाव की जीत भी उनको फर्श से अर्श तक का सफर तय करने का बहुत मजबूत जरिया है, इसलिए पैक्स से होने वाली कमाई की जानकारी जिसको भी है वह हर व्यक्ति पैक्स अध्यक्ष की कुर्सी के लिए लालायित है. भले ही पैक्स चुनाव होने में अभी लगभग डेढ़ माह का समय है, लेकिन चुनावी जोड़ तोड़ की गोटी अभी से सेट करने का सिलसिला परवान चढ़ने लगा है, कैसे पैक्स अध्यक्ष की कुर्सी बरकरार रखें, इसको लेकर भी अभी से मंथन शुरू हो गया है. पैक्सों की मतदाता सूची में नाम जोड़ने व सदस्यता रसीद काटने में भी पैक्स अध्यक्षों द्वारा खेला किया जा रहा है, वैसे व्यक्ति जो 11 रुपये कप रसीद कटवाना चाहते हैं और मजबूत स्थिति में हैं, जिनसे पैक्स अध्यक्षों को भी ऐसा लगता है कि चुनाव में वह भी अपनी प्रबल दावेदारी पेश कर उनको मात दे सकता है, तो ऐसे व्यक्तियों को 11 रुपये की रसीद काटने के लिए पैक्स तैयार ही नहीं हैं. क्योंकि, उनको अपनी कुर्सी पर संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं. जबकि, पद की दावेदारी वही व्यक्ति पेश कर सकता है, जिसने 11 रुपये की रसीद कटवा रखी हो, वहीं जिनका एक रुपये का रसीद कटता है वे पैक्स चुनाव में उच्च पद के लिए अपनी दावेदारी पेश नहीं कर सकते हैं. 11 रुपये की रसीद कटवाने के लिए भी पैक्स अध्यक्षों से वैसे लोगों को लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं. ऐसे लोगों को प्रखंड सहकारिता पदाधिकारी से लेकर जिला सहकारिता पदाधिकारी के कार्यालय का चक्कर काटना पड़ रहा है, फिर भी कोई ठोस सुनवाई नही हो पा रही है, क्योंकि, पैक्स अध्यक्षों व अधिकारियों की मिलीभगत से खेला किया जाता है. दूसरे राज्यों के लोगों को भी बनाया गया है मतदाता पैक्स भी अच्छी इनकम का एक जरिया बन चुका है. आलम यह है कि अध्यक्ष की कुर्सी को बरकरार रखने के लिए तो कुछ पैक्सों ने सभी नियमों को दरकिनार कर दूसरे राज्यों में रहने वाले अपने करीबी रिश्तेदारों का नाम भी पैक्स की मतदाता सूची में अंकित कर उनको वोटर बना रखा है. वहीं, मतदान के दिन उनके करीबी मतदाता जो दूसरे राज्यों से आते है, उनकी अच्छी खातिरदारी की जाती है. यहां तक कि उनके आने जाने वाले खर्च का वहन भी प्रत्याशी द्वारा किया जाता है. चुनाव में जीत हासिल होने के बाद एकबार फिर उन करीबी लोगों को बुलाकर अपने पक्ष के सभी वोटरों को शामिल कर रंगारंग पार्टी भी दी जाती है, इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आखिर पैक्स चुनाव जीतने के लिए प्रत्याशी इतने बेताब क्यों है? हालांकि ऐसे पैक्स अध्यक्ष जिन्होंने चुनाव में जीत हासिल करने के लिए बाहरी लोगों को मतदाता बनाया है, उनके खिलाफ जांच व कार्रवाई को लेकर कुछ लोगों ने प्रखंड व जिला से लेकर सूबे की राजधानी में बैठे विभागीय अधिकारियों से लिखित शिकायत की गयी है. उन वरीय अधिकारियों ने जिला स्तर पर अधिकारियों को जांच का आदेश भी दे दिया है, लेकिन इन लोगों ने जांच के नाम पर घालमेल कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. मतदाता सूची में अधिकतर छोटे किसानों के ही नाम शामिल पैक्स की मतदाता सूची में बड़े व मध्यम वर्गीय किसानों का नाम काफी कम संख्या में शामिल किया गया है, जबकि वैसे लोग जो बहुत छोटे किसान है या फिर बंटाई पर लेकर खेती करते है उनका नाम अधिक संख्या में मतदाता सूची में शामिल किया गया है. क्योंकि, पैक्सों को यह भली भांति पता है कि उनके बराबर के या उनसे मजबूत किसानों का यदि अधिक संख्या में नाम पैक्सों की मतदाता सूची में जोड़ा गया, तो पैक्स चुनाव में वे भी प्रत्याशी के रूप में मजबूती के साथ अपनी दावेदारी पेश कर चुनाव मैदान में ताल ठोकेंगे, जिनको चुनौती देना उन पैक्स अध्यक्षों के लिए आसान नहीं होगा. शायद इसीलिए अधिक संख्या में कमजोर वर्ग के किसानों का नाम मतदाता सूची में दर्ज कर उनको वोटर बनाये जाने में ही पैक्सों द्वारा अधिक दिलचस्पी ली जाती है, ताकि धन बल का प्रयोग कर उन्हें अपने पाले में लिया जा सके. मालूम हो कि मोहनिया प्रखंड में 19 पैक्स व एक व्यापार मंडल संचालित हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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